

Raj Thackeray on CJP Protest Delhi Police Action: नीट पेपर लीक और केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे युवाओं पर हुए पुलिसिया लाठीचार्ज को लेकर राजनीति लगातार गरमाती जा रही है। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) के अध्यक्ष राज ठाकरे ने आंदोलनकारी छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई पर गहरा रोष व्यक्त किया है।
अपने सोशल मीडिया अकाउंट 'एक्स' (X) पर एक विस्तृत पोस्ट साझा करते हुए राज ठाकरे ने दिल्ली पुलिस की कार्रवाई को बदले की भावना से प्रेरित बताया और इसके लिए प्रशासनिक व राजनीतिक व्यवस्था को सीधे तौर पर कटघरे में खड़ा किया।
राज ठाकरे ने पुलिसिया कार्रवाई की तुलना स्कूलों में मिलने वाली शारीरिक सजा से करते हुए तीखा सवाल दागा। उन्होंने कहा, "यदि स्कूलों में छात्रों को मारने पर शिक्षकों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई हो सकती है, तो फिर दिल्ली में छात्रों को बेरहमी से पीटने वाले पुलिस अधिकारियों और ऐसे दमनकारी आदेश देने वालों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही?"
मनसे प्रमुख ने जोर देकर कहा कि वीडियो में साफ दिख रहा है कि पुलिस केवल भीड़ को तितर-बितर नहीं कर रही थी, बल्कि निर्दोष छात्रों और आसपास खड़े लोगों को बेरहमी से कुचल रही थी। उन्होंने दावा किया कि पुलिस प्रशासन की यह बर्बर हरकत बिना 'ऊपर से मिले खास आदेशों' के संभव नहीं हो सकती।
पुलिस बल के दुरुपयोग पर सवाल उठाते हुए राज ठाकरे ने कहा कि महाराष्ट्र पुलिस हो या कोई अन्य बल, निचले स्तर के अधिकारियों के पास आदेश मानने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता। असली सवाल उस सिस्टम से है जिसने ऐसी अंधाधुंध पिटाई के आदेश दिए।
उन्होंने पूछा, "क्या यह व्यवस्था खुद को देश के संविधान से भी ऊपर समझती है? अंतरराष्ट्रीय मानकों, जैसे एमनेस्टी इंटरनेशनल और स्वीडन-डेनमार्क जैसे देशों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि वहां पुलिस द्वारा बल प्रयोग की निष्पक्ष जांच होती है और आदेश देने वाले शीर्ष अधिकारियों पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। विश्व गुरु बनने का ख़्वाब दिखाने वालों को भारत में भी ऐसी ही सख्त जांच प्रणाली अपनानी चाहिए।"
राज ठाकरे ने संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका पर भी हैरानी जताई। उन्होंने कहा कि एक तरफ युवाओं को मुख्य न्यायाधीश द्वारा खारिज कर दिया जाता है, तो दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट कहता है कि उसके पास मारपीट के वीडियो देखने का समय नहीं है।
उन्होंने कहा, "आखिर न्यायपालिका के पास किस चीज के लिए समय है? जब युवाओं का सरकार और व्यवस्था से भरोसा उठ जाता है, तभी वे सड़कों पर उतरने को मजबूर होते हैं। लोकतंत्र की परिपक्वता असहमति की आवाजों को दबाने में नहीं, बल्कि उन्हें संयम से सुनने और समाधान निकालने में होती है।" उन्होंने सभी संसद सदस्यों से इस मुद्दे पर संसद के भीतर तत्काल गंभीर चर्चा कराने की मांग की है।