
भाजपा में विवाद (सौजन्य-सोशल मीडिया)
Gadchiroli Politics: गड़चिरोली जिले में हाल ही में संपन्न नप के उपाध्यक्ष, सभापति तथा स्वीकृत सदस्य पदों के चुनाव स्थानीय स्वशासन का उत्सव बनने के बजाय जिला-बाहरी नेताओं के खुले हस्तक्षेप का प्रदर्शन बनकर रह गए। इसके कारण विशेष रूप से भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों में स्थानीय पदाधिकारियों के बीच असंतोष फैल गया है और आंतरिक गुटबाजी को बल मिला है।
नगराध्यक्ष पद की उम्मीदवारी हो या उपाध्यक्ष, स्वीकृत सदस्य और सभापति पदों का बंटवारा, हर निर्णय स्थानीय कार्यकर्ताओं की राय से अधिक बाहरी नेताओं की बैठकों और निर्देशों पर आधारित रहा, ऐसी चर्चा अब दबे स्वर में नहीं बल्कि खुलेआम हो रही है। गड़चिरोली जैसे जिले में जहां स्थानीय मुद्दों, सामाजिक समीकरणों और कार्यकर्ताओं की नब्ज समझने वाले नेता मौजूद हैं, उन्हें जानबूझकर हाशिये पर डाल दिया गया।
स्थानीय नेतृत्व केवल नाममात्र का रह गया, जबकि वास्तविक नियंत्रण जिला-बाहरी विधायकों और नेताओं के हाथों में रहा। इससे यह सवाल खड़ा हो गया है कि, क्या दलों के भीतर लोकतंत्र शेष रहा है या नहीं।
भाजपा के चिमूर के विधायक बंटी भांगड़िया के हस्तक्षेप से असंतोष भड़कता दिखाई दे रहा है। उम्मीदवारी से लेकर सत्ता गठन की प्रक्रिया तक उनकी राय को प्राथमिकता दिए जाने से गड़चिरोली के स्थानीय नेता, नगरसेवक और जिला अध्यक्ष गहरी असहजता महसूस कर रहे हैं। पार्टी विस्तार के लिए संघर्ष करने वाले कार्यकर्ताओं की उपेक्षा कर बाहरी ताकतों को केंद्र में रखने से भाजपा के भीतर आंतरिक संघर्ष और तीव्र हो गया है।
कांग्रेस में भी स्थिति अलग नहीं है। ब्रह्मपुरी के विधायक विजय वडेट्टीवार के हस्तक्षेप के कारण कांग्रेस के भीतर के मतभेद सतह पर आ गए हैं। पदों के वितरण और स्वीकृत सदस्यों के चयन में उनके शब्द को अंतिम मान दिए जाने से जिला-स्तरीय नेतृत्व के अपमान की भावना पनपी है। इससे कांग्रेस में दबा हुआ असंतोष अब खुली बगावत की दिशा में बढ़ता दिख रहा है।
दोनों दलों के जिला अध्यक्ष इस पूरी प्रक्रिया से अत्यंत नाराज बताए जा रहे हैं और निर्णय प्रक्रिया से जानबूझकर दूर रखे जाने का आरोप लगाया जा रहा है। इसी नाराजगी से दलों में गुटबाजी को खाद-पानी मिला है और एक-दूसरे के खिलाफ राजनीतिक चालें चलने की चर्चा है। फिलहाल यह गुटबाजी दबाई हुई है, लेकिन कभी भी विस्फोटक रूप ले सकती है।
नगरपालिका चुनावों में उत्पन्न यह आंतरिक कलह आगामी जिला परिषद और पंचायत समिति चुनावों में दोनों दलों के लिए घातक साबित हो सकती है। नाराज नेता, निष्क्रिय कार्यकर्ता और छिपा हुआ विरोधी राजनीतिक खेल इन सबका सीधा नुकसान भाजपा और कांग्रेस को उठाना पड़ सकता है। स्थानीय स्तर पर एकजुटता न होने पर सत्ता के समीकरण पूरी तरह बदल सकते हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, जिला-बाहरी नेताओं का अत्यधिक हस्तक्षेप अल्पकाल में सत्ता समीकरण साधने में सहायक हो सकता है, लेकिन दीर्घकाल में यह दलों के लिए आत्मघाती सिद्ध होता है। गड़चिरोली में जो कुछ हो रहा है, वह स्थानीय नेतृत्व की घुटन और कार्यकर्ताओं के विश्वासघात का जीवंत उदाहरण माना जा रहा है।
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स्थानीय नेतृत्व को न्याय न मिला तो सत्ता का रास्ता कठिन गड़चिरोली जैसे संवेदनशील जिले में राजनीति को ‘रिमोट कंट्रोल’ से चलाने का प्रयास किया गया तो उसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे, यह अब स्पष्ट है। यदि दोनों दलों ने समय रहते सबक नहीं लिया, तो आने वाले चुनाव स्थानीय कार्यकर्ताओं के आक्रोश को अभिव्यक्त करने वाला रणक्षेत्र बन सकते हैं।
बाहरी नेताओं के हस्तक्षेप के कारण गड़चिरोली नप की विषय समितियों के सभापति पद के चयन को लेकर भाजपा में आंतरिक संघर्ष इतना तीव्र हो गया कि वह निचले स्तर की तीखी बहस से आगे बढ़ते हुए हाथापाई तक जा पहुंचा। इस घटनाक्रम में विधायक डा. मिलिंद नरोटे और पार्टी के पूर्व जिला अध्यक्ष के बीच गंभीर मतभेद खुलकर सामने आए।
विशेष रूप से उल्लेखनीय यह है कि, यह पूरा घटनाक्रम भाजपा के वरिष्ठ नेताओं की उपस्थिति में घटित हुआ। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, इस पूरे विवाद के पीछे बाहरी नेताओं का हस्तक्षेप ही मुख्य कारण माना जा रहा है, जिससे स्थानीय नेतृत्व में असंतोष और टकराव की स्थिति उत्पन्न हुई।






