गैस सिलेंडर की बढ़ती कीमतों से उज्ज्वला योजना बेअसर, ग्रामीण महिलाएं लकड़ी जलाने को विवश
Ujjwala Yojana: प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत गैस सिलेंडरों की बढ़ती कीमतों के कारण ग्रामीण महिलाएं फिर से लकड़ी के चूल्हों पर लौटने को मजबूर हो गई हैं।
- Written By: आंचल लोखंडे
cooking gas crisis (सोर्सः सोशल मीडिया)
Bhandara Ujjwala Yojana News: केंद्र सरकार द्वारा महिलाओं को धुएं से मुक्त जीवन देने और पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य से शुरू की गई महत्वाकांक्षी प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना आज अपने मूल उद्देश्य से भटकती हुई नजर आ रही है। गैस सिलेंडरों की लगातार बढ़ती कीमतों के कारण यह योजना ग्रामीण क्षेत्रों में प्रभावी रूप से निष्क्रिय होती दिखाई दे रही है। जिले के विभिन्न इलाकों में हजारों घरों में गैस चूल्हे और सिलेंडर उपलब्ध होने के बावजूद महंगाई के चलते उनका उपयोग बंद हो गया है, जिससे महिलाओं को एक बार फिर पारंपरिक चूल्हों पर खाना पकाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
वर्ष 2016 में उज्ज्वला योजना की शुरुआत के समय ग्रामीण महिलाओं में जबरदस्त उत्साह देखा गया था। जंगल से लकड़ी लाने की मेहनत से छुटकारा मिलेगा और धुएं से होने वाली आंखों एवं श्वसन संबंधी बीमारियों से राहत मिलेगी। इसी उम्मीद के साथ महिलाओं ने इस योजना का स्वागत किया था। योजना के तहत मुफ्त गैस चूल्हे और सिलेंडर वितरित किए गए तथा शुरुआती दौर में सब्सिडी भी दी गई।
परिवार का खर्च उठाना लगभग असंभव
हालांकि, समय के साथ रिफिलिंग की कीमतें आम जनता की पहुंच से बाहर होती चली गईं। वर्तमान में एक गैस सिलेंडर भरवाने के लिए 950 से 1000 रुपये तक खर्च करना पड़ रहा है। ग्रामीण महिलाओं का कहना है कि घर में सिलेंडर तो है, लेकिन उसे भरवाने के लिए इतने पैसे कहां से लाएं? दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर परिवारों के लिए यह खर्च उठाना लगभग असंभव हो गया है।
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गैस की बढ़ती कीमतों के चलते महिलाएं फिर से जंगल की ओर रुख करने को मजबूर हैं। ईंधन के लिए लकड़ी इकट्ठा करने की दिनचर्या दोबारा शुरू हो गई है। चूल्हे के धुएं से आंखों में जलन, सांस की तकलीफ और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा फिर बढ़ गया है। वहीं, लकड़ी के लिए हो रही अंधाधुंध कटाई से पर्यावरण संतुलन बिगड़ने की आशंका भी गहराती जा रही है।
गैस सिलेंडर केवल शोपीस बनकर रह गए
ग्रामीण महिलाओं का कहना है कि शुरुआती दौर में कुछ सिलेंडर मुफ्त दिए गए, लेकिन बाद में हर रिफिलिंग के साथ चूल्हे और सिलेंडर की लागत भी वसूली जाने लगी, जिससे गरीब परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ा। इसका नतीजा यह हुआ कि कई इलाकों में गैस सिलेंडर केवल शोपीस बनकर रह गए हैं और उन पर धूल जम गई है।
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पीड़ित गृहिणियों का कहना है कि मजदूरी की आय से सिलेंडर भरवाना अब संभव नहीं रहा। सिलेंडर खाली होने के बाद उसे दोबारा भरवाने की हिम्मत नहीं होती, इसलिए पेट की आग बुझाने के लिए मजबूरन जंगल से लकड़ी लाकर चूल्हे पर ही खाना पकाना पड़ता है। ग्रामीण महिलाओं ने मांग की है कि उज्ज्वला योजना को प्रभावी बनाने के लिए गैस की कीमतों में राहत दी जाए, ताकि वे वास्तव में धुआं-मुक्त जीवन जी सकें।
