धोखाधड़ी: धान व्यापारी ने की कई किसानों से ठगी, ढिवरवाड़ा में किसानों का फूटा गुस्सा

Dhivarwada News: ढिवरवाड़ा में धान व्यापारी सुरचंद बापू नेवारे ने किसानों से वजन कांटे में गड़बड़ी कर ठगी की । गुस्साए किसानों ने व्यापारी को गांव से बाहर निकाला।
व्यापारी को गांव से निकाला गया
व्यापारी को गांव से निकाला गया (सौजन्यः सोशल मीडिया)
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Bhandara News: मोहाड़ी तहसील के जंगल क्षेत्र में स्थित ढिवरवाड़ा गांव इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है, क्योंकि सालई खुर्द निवासी धान व्यापारी सुरचंद बापू नेवारे द्वारा स्थानीय किसानों से बड़े पैमाने पर की गई ठगी का मामला उजागर हुआ है। पिछले तीन वर्षों से यह व्यापारी ढिवरवाड़ा क्षेत्र के किसानों से खरीफ और ग्रीष्म ऋतु में धान की खरीद कर रहा था। लेकिन उसने अपने इलेक्ट्रॉनिक कांटे (वजन मशीन) में पहले से ही गड़बड़ी की हुई थी। जैसे ही किसान बोरे काटे पर रखते, वह पेन के लाल बटन को दबाकर हर बोरे के वजन में 7 से 8 किलो तक की कमी दिखाता था।

जब किसानों को शक हुआ, तो उन्होंने वही बोरे दूसरे कांटे पर तोलकर देखा, जिससे यह ठगी सामने आई। इसके बाद मंगलवार 4 नवंबर को आक्रोशित किसानों ने व्यापारी नेवारे की जमकर खबर ली, उससे बकाया राशि वसूल की और आगे उसे गांव से निकाल दिया। हालांकि, इस मामले में पुलिस में कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई गई है।

प्रकृति के बाद अब व्यापारियों का अन्याय

किसान पहले ही प्रकृति की मार झेल रहे हैं और अब व्यापारी भी उनके पसीने की कमाई लूट रहे हैं ऐसा इस घटना से साफ झलकता है। ग्रामीणों का कहना है कि, प्रकृति फसलों को बर्बाद करती है और ये व्यापारी किसानों की जिंदगी को, कई किसानों का विश्वास है कि इस तरह की सेटिंग लगभग 90% इलेक्ट्रॉनिक कांटों में की जाती है।

मेकैनिक ने खोला मशीन का राज

एक इलेक्ट्रॉनिक कांटा मरम्मत करने वाले मेकैनिक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि कांटों में सेटिंग करने के लिए व्यापारी मोटी रकम देते हैं और मशीन के सर्किट में बदलाव कर वजन घटाया जाता है।

पुराने वजन कांटे ही अधिक भरोसेमंद

किसानों का कहना है कि पुराने वजन वाले कांटे कहीं अधिक भरोसेमंद हैं। उनमें 100-200 ग्राम का फर्क हो सकता है, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक कांटे तो किसानों का खून चूसते हैं। इसलिए कई किसान अब फिर से पारंपरिक वजन कांटे इस्तेमाल करने की ओर लौट रहे हैं।

अधिकारियों की भूमिका पर सवाल

गांववालों का आरोप है कि इस तरह की गतिविधियों की जानकारी स्थानीय अधिकारियों को पहले से होती है, फिर भी वे कोई कार्रवाई नहीं करते। उल्टा कुछ अधिकारी "जांच" के नाम पर व्यापारियों से पैसे लेकर चुप बैठ जाते हैं, जिससे किसान लाचारी और निराशा में जी रहे हैं।

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