प्रतीकात्मक तस्वीर (सोर्स : सोशल मीडिया )
Sambhajinagar Election BJP Majority Win: छत्रपति संभाजीनगर नगर निगम चुनाव में भाजपा का अकेले चुनाव लड़ने का फैसला सही साबित हुआ है। भाजपा ने 58 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया है। वहीं शिवसेना (शिंदे) 12 सीट पर ही सिमट गई।
शिंदे गुट द्वारा भाजपा से गठबंधन न करने का निर्णय उनके लिए नुकसानदायक साबित हुआ। पालकमंत्री संजय शिरसाट का स्वबल पर चुनाव लड़ने का फैसला उल्टा पड़ गया। हालांकि, नगर निगम में सत्ता के लिए भाजपा और शिवसेना के फिर से साथ आने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
वहीं एमआईएम ने अपनी वोट बैंक को काफी हद तक बचाए रखा। यहां एमआईएम ने 33 सीटें जीती। लेकिन उन्हें कुछ सीटों का नुकसान हुआ है। शिवसेना (यूबीटी) और वंचित बहुजन आघाड़ी को सीमित सफलता मिली। वहीं राष्ट्रवादी कांग्रेस (शरद गुट) का खाता खुलना एक महत्वपूर्ण बात रही।
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने टॉक शो और प्रचार के माध्यम से विकास कार्यों और ‘भगवा की शान’ की बात रखी, जिसे संभाजीनगर के मतदाताओं ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी। इसके विपरीत, शिंदे गुट की शिवसेना में कई नेताओं के बच्चों को टिकट दिए गए। जिससे पार्टी में असंतोष फैला गया।
संजय शिरसाट ने अपने बेटे सिद्धांत और बेटी हर्षदा को टिकट दिया। पुराने नगरसेवकों को प्राथमिकता देने से नए और बाहर से आए कार्यकर्ता नाराज हुए। खुद शिरसाट अपने बच्चों के वार्ड में उलझकर रह गए, जिसका असर पार्टी के प्रदर्शन पर पहा। ‘हम ही बड़े भाई है’ का दावा करने वाली शिवसेना को अब छोटे भाई की भूमिका में आना पड़ेगा।
छत्रपति संभाजीनगर नगर निगम में दूसरे नंबर पर एमआईएम रही, जबकि शिवसेना यूबीटी तीसरे स्थान पर खिसक गई है। एमआईएम नेता इम्तियाज जलील ने इस स्थिति के लिए भाजपा की रणनीति को जिम्मेदार ठहराया, जलील ने कहा कि औरंगाबाद में मिली जीत से हम बहुत खुश है।
यहां एमआईएम को लोगों ने दिल से स्वीकार किया है। भाजपा की जीत स्वाभाविक है, क्योंकि उनके पास पैसा था और पूरी ताकत थी, लेकिन भाजपा का असली लक्ष्य पूरे महाराष्ट्र में शिवसेना को कमजोर करना था। उन्होंने शिवसेना गठबंधन तोड़ा था, उसमें वे सफल रहे हैं।
नगर निगम चुनाव में लगभग 60 प्रतिशत मतदान हुआ। भाजपा, शिवसेना, राष्ट्रवादी, कांग्रेस, उद्धव ठाकरे गुट, एमआईएम और वंचित आघाडी-सभी दलों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा। भाजपा के लिए अकेले चुनाव लड़ना गेम चेंजर साबित हुआ। बगावत और नाराजगी के बावजूद भाजपा ने सबसे बेहतर जीत दर दर्ज की।
टिकट वितरण में अन्याय, पैसे लेकर टिकट देने के आरोप और एमआईएम ने अपनी वोट बैंक काफी हद तक बचाई। 22 पूर्व नगरसेवकों के टिकट काटने का कुछ नुकसान जरूर हुआ, पिछली बार 25 सीटों के साथ विपक्ष में रही एमआईएम को इस बार भी विपक्ष में ही बैठना पड़ेगा।
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उन्हें 4-5 सीटों का नुकसान हुआ है। लेकिन भारी नाराजगी और नए चेहरों को मौका देने के बावजूद इम्तियाज जलील का प्रयोग काफी हद तक सफल माना जा रहा है। इसमें असदुद्दीन ओवैसी की जमीनी स्तर पर की गई मेहनत भी अहम रही।
इतिहास में पहली बार 90 से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने वाली शिवसेना (यूबीटी) को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। मुस्लिम वोट पाने के लिए पूर्व महापौर अब्दुल रशीद खान उर्फ मामू को लेने का प्रयोग भी असफल रहा। इससे चंद्रकांत खैरे नाराज हो गए, उम्मीदवार चयन और पूरी रणनीति अंबादास दानवे के हाथ में होने से खैरे ने प्रचार में ज्यादा रुचि नहीं ली।