
प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स: सोशल मीडिया )
Sambhajinagar Central Folk Art Festival: छत्रपति संभाजीनगर ‘माता-पिता, संविधान, प्रेम व दुःख’ जैसे जीवन के विविध विषयों को समेटती एक से बढ़कर एक काव्य रचनाएं प्रस्तुत करते हुए लोककवि प्रशांत मोरे ने पहले केंद्रीय लोककला महोत्सव का भावपूर्ण उद्द्घाटन किया।
उनकी सशक्त कविताओं पर श्रोताओं ने जोरदार तालियां बजाई व सभागार में उत्सव दिखा। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाड़ा विश्वविद्यालय की ओर से आयोजित पहले केंद्रीय लोककला महोत्सव उद्घाटन कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलपति डॉ. विजय फुलारी ने की।
इस अवसर पर प्र-कुलपति डॉ. वाल्मीक सरवदे, कुलसचिव डॉ. प्रशांत अमृतकर, राज्यपाल नामनिर्देशित प्रबंधन परिषद सदस्य डॉ। गजानन सानप, प्राचार्य गौतम पाटील मौजूद थे।
फुलारी ने कहा कि राज्य के सभी 24 विवि के छात्रों को लोककलाओं के जरिए मंच पर लाने का जिम्मा बामू पर सौंपा गया है। इसके तहत स्वतंत्र लोककला अकादमी की स्थापना की जाएगी।
डॉ. कैलाश अंभुरे ने कहा कि मिट्टी की खुशबू व पूर्वजों की विरासत से उपजी लोककला ही समस्त कलाओं की मूल आधारशिला है। इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए उद्घाटन भाषण में कवि मोरे ने प्रेम से लेकर विद्रोह तक की विविध कविताएं प्रस्तुत की।
मोरे ने कहा कि जब उनकी कविताओं को लोककला की सच्ची हुन मिली, तो कविता गीत बन गई व हर जगह गाई जाने लगी, फिल्मों के माध्यम से वह लोकप्रिय हुई व स्थानीय बोली-भाषा की रचनाएं पहचान पाने लगीं।
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इसके लिए निरंतर मेहनत जरूरत है। एक कुंकवापाई दूरं मैना उडूनं जाईल। याद देता तुझी मैना राधू एकला राहील। ‘और ‘तुझ्या नावाचं गौदणं हातावरी मी मिरवीन…. याद येता तुझी मैना हात मायेने फिरवीन…..इन पवितयों पर श्रीताओं ने विशेष रूप से तालियों से दाद दी। डॉ. समाधान इंगले ने संचालन किया व अमृतकर ने आभार माना।






