कभी स्कूल से किए गए थे बाहर, आज किताबों में पढ़ाए जाते हैं लोकशाहीर अन्नाभाऊ साठे, जानें उस एक दिन की कहानी
Annabhau Sathe Life Story: महज एक दिन स्कूल गए लोकशाहीर अन्नाभाऊ साठे आज पाठ्यक्रमों में पढ़ाए जाते हैं। जानें उनके उस एक दिन के अपमान और नन्हे तुकाराम के लोकशाहीर बनने की प्रेरक कहानी।
- Written By: गोरक्ष पोफली
लोकशाहीर अन्नाभाऊ साठे (सोर्स: एआई फोटो)
Annabhau Sathe Birth Anniversary: महाराष्ट्र के साहित्यिक और सामाजिक इतिहास में एक ऐसा अध्याय है, जो यह साबित करता है कि ज्ञान प्राप्त करने के लिए स्कूल की चारदीवारी अनिवार्य नहीं, बल्कि संघर्ष की तपिश जरूरी है। यह कहानी है तुकाराम भाऊराव साठे की, जिन्हें दुनिया आज लोकशाहीर अन्नाभाऊ साठे के नाम से जानती है।
आज महाराष्ट्र की बालभारती की पाठ्यपुस्तकों से लेकर मुंबई, नागपुर और बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाड़ा विश्वविद्यालय के उच्च शिक्षा पाठ्यक्रमों में उनके साहित्य और जीवन का अध्ययन किया जाता है। लेकिन इस गौरवशाली सफर की शुरुआत एक ऐसे अपमान से हुई थी, जिसने शिक्षा के औपचारिक ढांचे को हमेशा के लिए बदल दिया।
स्कूल का वह डेढ़ दिन और विद्रोह की शुरुआत
अन्नाभाऊ साठे का जन्म 1 अगस्त, 1920 को सांगली के वाटेगांव में एक अत्यंत गरीब मातंग परिवार में हुआ था। जब वे पहली बार प्राथमिक स्कूल पहुंचे, तो उन्हें वहां शिक्षा नहीं बल्कि जातिगत घृणा का सामना करना पड़ा। स्कूल में उनके कदम रखते ही उच्च जाति के शिक्षक ने उनके खिलाफ अभद्र और अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया। इतना ही नहीं, उनके सहपाठियों ने भी उनका बहिष्कार कर दिया।
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महज डेढ़ दिन के भीतर मिले इस तीखे अपमान ने नन्हे तुकाराम (अन्नाभाऊ साठे) के भीतर विद्रोह की ज्वाला भड़का दी। उन्होंने उसी क्षण अपना स्कूल बैग फेंक दिया और स्कूल की दहलीज को सदा के लिए छोड़ दिया। वह एक दिन का अपमान उनके लिए केवल एक व्यक्तिगत चोट नहीं थी, बल्कि उन्होंने अपनी पूरी पीढ़ी की उस विवशता को पहचान लिया था, जिसे सामाजिक व्यवस्था ने सदियों से दबा कर रखा था।
सड़कों पर सीखा क, ख, ग
स्कूल छोड़ने के बाद अन्नाभाऊ का परिवार काम की तलाश में मुंबई शहर आ गया, जहां उन्होंने कुली, फेरीवाले और मिल मजदूर के रूप में कठिन श्रम किया। औपचारिक शिक्षा के अभाव में भी उन्होंने ज्ञान की खोज जारी रखी। मुंबई के माटुंगा लेबर कैंप में रहते हुए, उन्होंने सड़कों पर लगे दुकानों के बोर्ड और फिल्मों के पोस्टर देख-देखकर मराठी वर्णमाला के अक्षर पहचानना सीखा। बाद में, उन्होंने मार्क्सवादी और अंबेडकरवादी साहित्य का गहन अध्ययन किया, जिसने उनके लेखन को वैचारिक धार दी।
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सिलेबस का नायक बनने तक का सफर
जिस व्यक्ति को स्कूल ने अपमानित कर बाहर निकाला था, उसी ने आगे चलकर 35 उपन्यास (जैसे फकीरा), 13 लघु कथा संग्रह और दर्जनों नाटक रचकर मराठी साहित्य का चेहरा बदल दिया। उनके प्रसिद्ध उपन्यास फकीरा को 1961 में महाराष्ट्र सरकार द्वारा पुरस्कृत किया गया था, जो आज कई विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है।
वे एक ऑर्गेनिक इंटेलेक्चुअल के रूप में उभरे, जिन्होंने यह संदेश दिया कि पृथ्वी शेषनाग के मस्तक पर नहीं, बल्कि श्रमिकों और दलितों के श्रम पर टिकी है। आज उनके कार्यों का अनुवाद रूसी, जर्मन और पोलिश जैसी अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में हो चुका है। अन्नाभाऊ साठे का पाठ्यक्रमों में शामिल होना इस बात का प्रमाण है कि अन्याय के खिलाफ एक दिन का वह विद्रोह, अंततः समाज के लिए न्याय का मार्ग बन गया।
