जब शूटिंग के दौरान हुआ बड़ा हादसा, भगवान दादा के थप्पड़ से ललिता पवार को हुआ फेशियल पैरालिसिस
Bhagwan Dada Birth Anniversary: 'हिम्मत-ए-मर्दा' की शूटिंग के दौरान ललिता पवार के साथ हुए हादसे ने भगवान दादा का करियर बदल दिया था। इस घटना का अफसोस भगवान दादा को जीवनभर रहा।
- Written By: सोनाली झा
भगवान दादा (फोटो सोर्स-सोशल मीडिया)
Bhagwan Dada Birth Anniversary Special Story: भारतीय सिनेमा के पहले डांसिंग और एक्शन स्टार माने जाने वाले भगवान दादा का नाम फिल्म इंडस्ट्री के इतिहास में बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। 1 अगस्त 1913 को जन्मे भगवान दादा का पूरा नाम भगवान आभाजी पालव था। उन्होंने अपने दम पर फिल्म इंडस्ट्री में पहचान बनाई और कई यादगार फिल्मों में काम किया। उनकी जन्म जयंती पर आइए जानते हैं उनकी जिंदगी से जुड़े कुछ ऐसे किस्से, जिन्होंने उन्हें एक कलाकार ही नहीं बल्कि एक नेक इंसान के रूप में भी अमर बना दिया।
आर्थिक तंगी के बीच पले-बढ़े भगवान दादा को बचपन से ही अभिनय का शौक था। परिवार की मदद के लिए उन्होंने शुरुआती दिनों में मजदूरी भी की, लेकिन फिल्मों में काम करने का सपना कभी नहीं छोड़ा। उन्होंने मूक फिल्म ‘क्रिमिनल’ से अपने अभिनय करियर की शुरुआत की। इसके बाद साल 1934 में आई उनकी पहली बोलती फिल्म ‘हिम्मत-ए-मर्दा’ ने उन्हें नई पहचान दिलाई।
एक थप्पड़ ने बदल दी ललिता पवार की जिंदगी
‘हिम्मत-ए-मर्दा’ की शूटिंग के दौरान एक ऐसा हादसा हुआ, जिसने अभिनेत्री ललिता पवार की जिंदगी हमेशा के लिए बदल दी। फिल्म के एक दृश्य में भगवान दादा को ललिता पवार को थप्पड़ मारना था, लेकिन शूटिंग के दौरान थप्पड़ इतनी जोर से लगा कि वह जमीन पर गिर पड़ीं। उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया, जहां वह दो दिनों तक कोमा में रहीं। बाद में उन्हें फेशियल पैरालिसिस हो गया, जिससे उनके चेहरे का एक हिस्सा प्रभावित हुआ और एक आंख छोटी हो गई।
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हादसे का असर और भगवान दादा का पछतावा
इस हादसे के बाद ललिता पवार करीब चार साल तक फिल्मों से दूर रहीं। जब उन्होंने वापसी की तो उन्हें पहले जैसे मुख्य किरदार नहीं मिले और धीरे-धीरे वह फिल्मों में खलनायिका के किरदारों के लिए मशहूर हो गईं। कहा जाता है कि इस घटना का भगवान दादा को जीवनभर गहरा अफसोस रहा और उन्होंने इसे कभी नहीं भुलाया।
बड़े दिल वाले इंसान भी थे भगवान दादा
भगवान दादा सिर्फ एक शानदार अभिनेता ही नहीं, बल्कि बेहद दयालु इंसान भी थे। वर्ष 1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन के दौरान हुए सांप्रदायिक दंगों में उन्होंने कई मुस्लिम कलाकारों को अपने घर में शरण देकर इंसानियत की मिसाल पेश की। उन्हें शेवरले कारों का भी खास शौक था और स्टंट करने का इतना जुनून था कि वे बिना बॉडी डबल के खतरनाक दृश्य खुद फिल्माते थे। राज कपूर उन्हें प्यार से ‘इंडियन डगलस’ कहकर बुलाते थे।
