कांग्रेस की शांत रणनीति ने बदले सत्ता समीकरण, लेकिन कई स्थानों पर बागियों ने किया ‘खेला’
Congress Quiet Strategy: अमरावती मनपा चुनाव में कांग्रेस ने शांत और रणनीतिक प्रचार से 15 सीटें जीतीं, लेकिन कई प्रभागों में बागियों के ‘खेला’ ने पार्टी की बढ़त सीमित कर दी।
- Written By: आंचल लोखंडे
यशोमती ठाकुर (सोर्सः सोशल मीडिया)
Amravati Municipal Election: मनपा चुनाव में कांग्रेस ने बिना किसी स्टार प्रचारक या रोड शो के शांत, संयमी और रणनीतिक प्रचार के दम पर 15 स्थानों पर सफलता हासिल की। बूथ स्तर पर गणित, माइक्रो प्लानिंग, स्थानीय समस्याओं की सटीक पहचान और मतदाताओं से सीधा संवाद पार्टी के लिए निर्णायक साबित हुआ।
हालांकि, मुस्लिम बहुल इलाकों के अलावा कई प्रभागों में कांग्रेस को बागियों और टिकट से वंचित इच्छुक उम्मीदवारों की वजह से नुकसान उठाना पड़ा। इन नेताओं ने कांग्रेस की बढ़त को रोकने में अहम भूमिका निभाई। वहीं, AIMIM ने पिछली बार की तुलना में कई स्थानों पर बेहतर प्रदर्शन करते हुए 10 से 12 सीटों तक पहुंच बनाई। दूसरी ओर, जिन बहुल इलाकों में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (अजीत पवार गुट) को उम्मीदें थीं, वहां भी दबंगों वाले प्रभागों में उसका पैनल निकल पाना मुश्किल साबित हुआ।
विलास इंगोले की भारी जीत
कांग्रेस सांसद बलवंत वानखडे के समन्वय में स्थानीय नेतृत्व को आगे रखते हुए गुटबाजी से दूर एकसंध रणनीति अपनाई गई। पूर्व मंत्री यशोमती ठाकूर और डॉ. सुनील देशमुख ने भी उम्मीदवार चयन और प्रचार रणनीति में मार्गदर्शन किया। जवाहरगेट-बुधवारा प्रभाग में कांग्रेस के पूरे पैनल की जीत और वरिष्ठ नेता विलास इंगोले की भारी जीत इस रणनीति की सफलता का उदाहरण है।
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मतदान से ठीक पहले जारी किए गए जाहीरनामे में शहर की स्वच्छता, जलापूर्ति, सड़क जैसी प्राथमिक समस्याओं के साथ-साथ पिछले नौ वर्षों में भाजपा शासित मनपा के कामकाज की कमियों को उजागर किया गया, जिसका मतदाताओं पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा।
कांग्रेस इस बार भी 15 सीटों पर ही सिमट गई
इसके बावजूद, वर्ष 2017 में 15 सीटें जीतने वाली कांग्रेस इस बार भी 15 सीटों पर ही सिमट गई और कोई बड़ी वापसी नहीं कर सकी। यह जीत भले ही सीटों के लिहाज से सीमित रही हो, लेकिन इसे संयमी नेतृत्व और रणनीति की जीत माना जा रहा है। हालांकि, दो प्रभागों को छोड़ दिया जाए तो यदि इन स्थानों पर कांग्रेस का पैनल नहीं निकलता, तो मनपा में पार्टी का स्थापित वर्चस्व लगभग समाप्त हो जाता।
दिग्गजों की हार से कांग्रेस को नुकसान
इस चुनाव में भाजपा के साथ-साथ कांग्रेस के भी कई दिग्गजों ने दूसरी और तीसरी बार अपनी किस्मत आजमाई थी। लेकिन कई स्थानों पर राकां (अजीत पवार गुट) के प्रवेश से मुकाबला कड़ा हो गया और कई वरिष्ठ नेताओं को हार का सामना करना पड़ा। इनमें पार्टी के प्रदेश सचिव आसीफ तवक्कल, पूर्व पार्षद बालू भूयार, डॉ. कांचन ग्रेसपुंजे, अरुण जायसवाल, संगीता वाघ, अल्पसंख्यक अध्यक्ष अब्दुल रफीक और डॉ. सोहेल बारी शामिल हैं।
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बागियों और ठुकराए गए नेताओं ने लिया बदला
पिछले 35-40 वर्षों से पार्टी के लिए निष्ठा से काम कर रहे कई स्थानीय कार्यकर्ताओं को इस बार मनपा चुनाव में टिकट मिलने की उम्मीद थी। लेकिन ऐन वक्त पर टिकट कटने से नाराज होकर ये नेता बहुल इलाकों सहित विभिन्न प्रभागों में कांग्रेस छोड़कर अजित पवार गुट की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए। मतदान के दिन उन्होंने कांग्रेस के खिलाफ सक्रिय रूप से काम किया, जिसका सीधा असर चुनाव नतीजों पर पड़ा। नतीजतन, जिन प्रभागों से कांग्रेस की जीत तय मानी जा रही थी, वहां पार्टी अपना पैनल तक नहीं बचा सकी।
शहरहित के लिए सभी दलों से समन्वय जरूरी : यशोमती ठाकूर
कांग्रेस की पूर्व मंत्री यशोमती ठाकूर ने कहा कि महानगरपालिका चुनाव में कांग्रेस ने जनता के मुद्दों को केंद्र में रखकर प्रचार किया। जिन स्थानों पर जनता ने हमें अवसर दिया है, वहां हम उनके विश्वास पर खरा उतरेंगे। लोकतंत्र के प्रति कांग्रेस सकारात्मक है और शहरहित के लिए सभी दलों के साथ समन्वय आवश्यक है।
