World Breastfeeding Week 2026: सिर्फ मां ही नहीं, पिता का साथ भी बनाता है ब्रेस्टफीडिंग का सफर आसान

Breastfeeding Week: ब्रेस्टफीडिंग सिर्फ नई मां की नहीं, बल्कि पूरे परिवार की जिम्मेदारी है। जानें कैसे पिता का इमोशनल और बिहेविरियल सहयोग मां का तनाव कम कर स्तनपान के सफर को आसान बनाता है।
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ब्रेस्टफीडिंग(फोटो.सोशल मीडिया)
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Father's Role in Breastfeeding: नई मांओं के लिए ब्रेस्टफीडिंग अकसर एक नया और अलग एक्सपीरियंस होता है, लेकिन अकसर ब्रेस्टफीडिंग को सिर्फ मां और बच्चे के बीच का रिश्ता माना जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस नए सफर को सफल बनाने में पिता की भूमिका भी बेहद अहम होती है।

भारत में आज भी स्तनपान को पूरी तरह मां की जिम्मेदारी समझा जाता है, जबकि सही समय पर पति का सहयोग नई मां के तनाव को कम कर सकता है और स्तनपान का अनुभव बेहतर बना सकता है।

विश्व स्तनपान सप्ताह (1-7 अगस्त) के मौके पर जानते हैं कि भारतीय परिवारों में पिता किस तरह मां और न्यूबॉर्न बेबी का सबसे बड़ा सपोर्ट बन सकते हैं।

मेहमानों की भीड़ से मां और बच्चे को दें आराम

भारत में बच्चे के जन्म के बाद रिश्तेदारों और मेहमानों का आना-जाना आम बात है, लेकिन शुरुआती दिनों में मां को बच्चे को दूध पिलाने के लिए शांत और निजी माहौल की जरूरत होती है। साथ ही मां के लिए आराम करना बेहद जरूरी है। ऐसे में पिता की जिम्मेदारी बनती है कि अगर मां असहज महसूस कर रही हो, तो विनम्रता से मेहमानों को थोड़ी देर बाद आने या दूसरे कमरे में बैठने के लिए कहें।

मां की छोटी-छोटी जरूरतों का रखें ध्यान

जब मां बच्चे को दूध पिलाने बैठती है, तो कई बार पानी की बोतल, तकिया, मोबाइल, रिमोट या कपड़ा दूर रह जाता है। ऐसे में बिना कहे ये चीजें लाकर देना उनके लिए बड़ी राहत हो सकती है।

बच्चे को सही पोजिशन में मां की गोद तक पहुंचाएं

डिलीवरी के बाद शुरुआती दिनों में मां को उठने-बैठने में परेशानी हो सकती है, खासकर तब जब सी-सेक्शन हुआ हो। ऐसे में पिता बच्चे को संभालें और फिर ब्रेस्टफीडिंग के लिए मां की गोद में दें और स्तनपान के बाद वापस गोद में लेकर डकार यानी बर्पिंग दिलाने में मदद करें।

मां को आराम करने का समय दें

बच्चे के सोने के दौरान पिता डायपर बदलने, कपड़े बदलने या बच्चे को कुछ देर गोद में रखने जैसी जिम्मेदारियां संभाल सकते हैं। इससे मां को आराम करने और रिकवर होने का समय मिलता है।

मां के खानपान को लेकर अनावश्यक टिप्पणी न करें

भारत में नई मां को लेकर घर से बाहर तक, कई तरह की सलाह दी जाती है। ऐसे में पति को यह ध्यान रखना चाहिए कि वे मां के खाने-पीने या चाय-कॉफी जैसी चीजों पर बिना डॉक्टर की सलाह के टिप्पणी न करें। यदि कोई भ्रम हो, तो डॉक्टर या लैक्टेशन कंसल्टेंट से संपर्क करें। इस तरह की चीजें नई मां को मेंटली परेशान करती है।

भावनात्मक रूप से सबसे बड़ा सहारा बनें

प्रसव के बाद हार्मोनल बदलाव, थकान और नींद की कमी के कारण नई मां कई बार भावुक या तनावग्रस्त महसूस करती है। ऐसे समय में उनकी आलोचना करने के बजाय उनका हौसला बढ़ाना, उनकी बात सुनना और यह एहसास दिलाना कि वे अकेली नहीं हैं, सबसे बड़ा सहयोग है।

घर के कामों में हाथ बंटाएं

भारतीय परिवारों में अक्सर मां से उम्मीद की जाती है कि बच्चे के जन्म के बाद जल्द से जल्द मां घर के काम संभालने लगे। ऐसे में पिता यदि खाना गर्म करना, बर्तन समेटना, बड़े बच्चे की देखभाल करना या बाजार से जरूरी सामान लाना जैसी जिम्मेदारियां निभाएं, तो मां पूरी तरह बच्चे और अपनी रिकवरी पर ध्यान दे पाएगी और जल्दी रिकवर होगी।

जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की मदद लेने के लिए प्रेरित करें

नई मांओं को कई तरह की समस्याओं से दो चार होना पड़ता है। ऐसे में अगर बच्चे को दूध पीने में दिक्कत हो रही है, मां को दूध पिलाने में दर्द हो रहा है या दूध कम बनने की चिंता है, तो इसे सामान्य मानकर नजरअंदाज न करें। पति को लैक्टेशन कंसल्टेंट या डॉक्टर से मिलने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।

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पिता का साथ क्यों है जरूरी?

जिन मांओं को अपने साथी का सहयोग मिलता है, उनमें स्तनपान लंबे समय तक जारी रखने की संभावना अधिक होती है। इससे मां का आत्मविश्वास बढ़ता है, तनाव कम होता है और बच्चे को भी स्तनपान का बेहतर लाभ मिल पाता है।

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