जिम्मेदार बच्चा या टूटा हुआ बचपन? रिवर्स पेरेंटिंग की हकीकत जानकर आप भी रह जाएंगे दंग
Child Mental Health Tips: कई बार परिस्थितियों के कारण बच्चे उम्र से पहले ही जिम्मेदारियों का बोझ उठाने लगते हैं। इस स्थिति को रिवर्स पेरेंटिंग कहा जाता है जहां बच्चा पेरेंस की भूमिका निभाता है।
- Written By: प्रीति शर्मा
बच्चे के साथ माता पिता (सौ. फ्रीपिक)
Reverse Parenting: बदलते दौर में पेरेंटिंग के मायने बदल रहे हैं। आजकल रिवर्स पेरेंटिंग का ट्रेंड चर्चा में है जहां बच्चे छोटी उम्र में ही माता-पिता की भावनात्मक या घरेलू जिम्मेदारियां संभालने लगते हैं। हालांकि यह सुनने में सुखद लग सकता है लेकिन मनोवैज्ञानिकों के अनुसार यह बच्चे के मानसिक विकास के लिए एक खतरनाक संकेत भी हो सकता है।
क्या होती है रिवर्स पेरेंटिंग
साधारण शब्दों में कहें तो जब माता-पिता और बच्चों की भूमिकाएं आपस में बदल जाती हैं तो उसे रिवर्स पेरेंटिंग या पैरेंटिफिकेशन (Parentification) कहा जाता है। इसमें बच्चा अपने माता-पिता के लिए एक सलाहकार, रक्षक या केयरटेकर की भूमिका निभाने लगता है। यह अक्सर उन घरों में देखा जाता है जहाँ माता-पिता किसी मानसिक तनाव, बीमारी या आपसी झगड़ों से जूझ रहे होते हैं।
फायदे या नुकसान
शुरुआती तौर पर रिवर्स पेरेंटिंग के कुछ फायदे नजर आ सकते हैं। ऐसे बच्चे अपनी उम्र से ज्यादा समझदार, आत्मनिर्भर और जिम्मेदार बन जाते हैं। वे मुश्किल समय में बेहतर निर्णय लेने में सक्षम होते हैं। लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू बहुत डरावना है।
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मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है बुरा असर
मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि जब एक बच्चा अपनी उम्र से बड़ा बोझ उठाता है तो उसका बचपन कहीं खो जाता है। इसके निम्नलिखित नुकसान हो सकते हैं।
- खेलने-कूदने की उम्र में घर की चिंताएं करने से बच्चा मानसिक रूप से थक जाता है। वह कभी अपनी उम्र के बच्चों की तरह बेफिक्र नहीं रह पाता।
- दूसरों की देखभाल करने के चक्कर में बच्चा अपनी भावनाओं को दबाने लगता है जिससे भविष्य में उसे गंभीर एंग्जायटी या डिप्रेशन का खतरा बढ़ जाता है।
- बड़े होने पर ऐसे बच्चों को दूसरों पर भरोसा करने में दिक्कत होती है। वे हमेशा कंट्रोलर की भूमिका में रहना चाहते हैं जिससे उनके निजी रिश्तों में टकराव पैदा होता है।
- बच्चा अपनी जरूरतों से पहले माता-पिता की जरूरतों को रखता है जिससे वह कभी यह जान ही नहीं पाता कि उसे खुद जीवन में क्या चाहिए।
क्या करें माता-पिता
यह जरूरी है कि माता-पिता अपनी समस्याओं के लिए बच्चों को इमोशनल सपोर्ट का जरिया न बनाएं। बच्चों को उनका बचपन जीने दें। उन्हें जिम्मेदार जरूर बनाएं लेकिन उन्हें अपनी उम्र के हिसाब से गलतियां करने और सीखने का मौका दें। अगर आपका बच्चा जरूरत से ज्यादा गंभीर हो गया है तो यह समय उसे फिर से बच्चा बनाने का है न कि उसकी मैच्योरिटी पर गर्व करने का।
संस्कार और जिम्मेदारी अच्छी बात है लेकिन इसकी कीमत बच्चे की मानसिक शांति नहीं होनी चाहिए। एक स्वस्थ समाज के लिए बच्चों का बच्चा बने रहना बहुत जरूरी है।
