दही-चूड़ा के बिना अधूरी रह जाएगी आपकी मकर संक्रांति, जानें बिहार की इस परंपरा के पीछे का इतिहास
Dahi Chura on Makar Sankranti: कर संक्रांति का पर्व बिहार में दही-चूड़ा के बिना अधूरा माना जाता है। यह परंपरा सिर्फ स्वाद तक सीमित नहीं है बल्कि इसके पीछे सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व भी जुडा है।
- Written By: प्रीति शर्मा
मकर संक्रांति पर दही चूड़ा (सौ. फ्रीपिक)
Dahi Chura Significance: उत्तर भारत खासकर बिहार और झारखंड में मकर संक्रांति का त्योहार दही-चूड़ा के बिना अधूरा माना जाता है। गुड़ की मिठास और तिलकुट की सोंधी खुशबू के बीच दही-चूड़ा का यह मेल सिर्फ एक पकवान नहीं बल्कि बिहार की सांस्कृतिक पहचान है। आइए जानते हैं आखिर क्यों इस दिन दही-चूड़ा खाना अनिवार्य माना जाता है।
जब सूर्य धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करते हैं तो पूरे देश में मकर संक्रांति मनाई जाती है। बिहार में इसे तिला संक्रांति के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन गंगा स्नान के बाद दही, चूड़ा, गुड़ और तिलकुट खाने की परंपरा है। यह रिवाज इतना गहरा है कि हर बिहारी घर में इस दिन चूड़ा और दही का ही वर्चस्व रहता है।
धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मकर संक्रांति से शुभ कार्यों की शुरुआत होती है। हिंदू धर्म में सफेद रंग को शुभता और शांति का प्रतीक माना जाता है। दही और चूड़ा दोनों ही सफेद रंग के होते हैं जो मन की शांति और नए जीवन की शुरुआत का संकेत देते हैं। मिथिलांचल और मगध के क्षेत्रों में इसे मिष्टान्न के रूप में देवताओं को अर्पित करने के बाद ही ग्रहण किया जाता है।
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सांस्कृतिक जुड़ाव और सामाजिक एकता
बिहार में दही-चूड़ा सिर्फ एक भोजन नहीं बल्कि सामाजिक मेलजोल का माध्यम है। संक्रांति के मौके पर दही-चूड़ा भोज का आयोजन होता है जहां लोग ऊंच-नीच का भेदभाव भूलकर एक साथ बैठते हैं। चूड़ा (पोहा) धान से बनता है जो नई फसल के आगमन का उत्सव है। किसान अपनी मेहनत की पहली उपज को दही के साथ मिलाकर खुशियां मनाते हैं।
शरीर के लिए फायदेमंद
वैज्ञानिक और स्वास्थ्य लाभ सिर्फ परंपरा ही नहीं विज्ञान भी इस कॉम्बिनेशन को सुपरफूड मानता है। चूड़ा हल्का होता है और दही प्रोबायोटिक्स से भरपूर होता है जो सर्दियों में पाचन तंत्र को दुरुस्त रखते हैं। गुड़ और तिल के साथ मिलकर यह शरीर को तुरंत ऊर्जा और गर्मी प्रदान करता है। इसके अलावा इसमें आयरन, कैल्शियम और विटामिन भरपूर मात्रा में होते हैं जो शरीर की इम्युनिटी बढ़ाते हैं।
बिहार का स्पेशल टच दही-चूड़ा के साथ कोहड़ा (कद्दू) की सब्जी और आलू-गोभी का झोर परोसने का खास चलन है। इसके बिना थाली अधूरी मानी जाती है। अंत में तिलकुट और गया का मशहूर तिलवा इस भोजन को पूर्णता प्रदान करता है।
