नहाने का ये गलत तरीका आपको कर सकता है बीमार! वात-पित्त और कफ वाले भूलकर भी न करें ये 1 गलती
Healthy Bathing Habits: रोजाना नहाना सेहत के लिए जरूरी है लेकिन अगर इसका तरीका सही न हो तो शरीर को नुकसान भी पहुंचा सकता है। वात, पित्त और कफ प्रकृति के लोगों को नहाते समय कुछ बातों का ध्यान रखें।
- Written By: प्रीति शर्मा
नहाते हुए व्यक्ति (सौ. फ्रीपिक)
Bathing Rules: आयुर्वेद में दिनचर्या का विशेष महत्व बताया गया है और स्नान इस दिनचर्या का एक अनिवार्य हिस्सा है। अक्सर लोग नहाने को केवल शरीर की बाहरी स्वच्छता से जोड़कर देखते हैं लेकिन आयुर्वेद के अनुसार यह मन और तन दोनों को शांति प्रदान करने वाली एक आध्यात्मिक और स्वास्थ्यवर्धक क्रिया है।
सही तरीके से किया गया स्नान न केवल ताजगी देता है बल्कि शरीर के तीन मूलभूत दोषों वात, पित्त और कफ को संतुलित करने में भी मदद करता है। हर व्यक्ति की शारीरिक प्रकृति अलग होती है इसलिए सभी के लिए एक जैसा पानी उपयुक्त नहीं हो सकता।
गुनगुना पानी कब नहाएं
यदि आपकी शारीरिक प्रकृति वात प्रधान है तो आपको अक्सर त्वचा में रूखापन महसूस होता होगा और आपके हाथ-पैर ठंडे रहते होंगे। आयुर्वेद के अनुसार वात दोष वाले व्यक्तियों को हमेशा गुनगुने पानी से स्नान करना चाहिए। ठंडा पानी वात को बढ़ा सकता है जिससे शरीर में जकड़न महसूस हो सकती है। इसके अलावा वात दोष वालों के लिए तेल मालिश बहुत लाभकारी है। स्नान के बाद शरीर पर किसी आयुर्वेदिक तेल से मालिश करने से त्वचा को गहराई से पोषण मिलता है और वात के कारण होने वाला रूखापन कम होता है।
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गर्म पानी से कब नहाएं
कफ दोष की प्रधानता वाले व्यक्तियों को अक्सर शरीर में भारीपन, सुस्ती और बार-बार जुकाम जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ऐसे लोगों के लिए गर्म पानी से नहाना सबसे उत्तम माना गया है क्योंकि गर्म जल शरीर में संचित कफ को कम करने में सहायक होता है। कफ प्रवृत्ति वालों को ठंडे पानी से पूरी तरह बचना चाहिए क्योंकि यह दोष को बढ़ाकर सुस्ती पैदा कर सकता है। साथ ही स्नान का समय भी महत्वपूर्ण है इन्हें सुबह जल्दी नहाना चाहिए और दोपहर के बाद स्नान करने से परहेज करना चाहिए।
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सामान्य जल का महत्व
जिन लोगों की प्रकृति पित्त होती है उन्हें गर्मी अधिक लगती है पसीना ज्यादा आता है और चेहरे पर मुंहासे या पेट में जलन की शिकायत रहती है। ऐसे व्यक्तियों के लिए सामान्य तापमान वाला पानी या हल्का ठंडा पानी सबसे उपयुक्त है। सामान्य जल पित्त को शांत करने और शरीर के बढ़े हुए तापमान को संतुलित करने में मदद करता है। हालांकि पित्त दोष वालों को बहुत अधिक ठंडे पानी के इस्तेमाल से बचना चाहिए क्योंकि यह शरीर का प्राकृतिक संतुलन बिगाड़ सकता है।
आयुर्वेद हमें सिखाता है कि अपने शरीर की प्रकृति को समझकर ही हमें अपनी आदतों में बदलाव करना चाहिए। सही तापमान के पानी से स्नान करना न केवल रोगों को कम करता है बल्कि व्यक्ति को दिनभर ऊर्जावान और स्वस्थ महसूस कराता है।
