
कॉन्सेप्ट फोटो (AI जनरेटेड एंड मोडिफाइड)
Mamata Banerjee vs ED: I-PAC ऑफिस पर छापे के बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और प्रवर्तन निदेशालय (ED) के बीच टकराव बढ़ गया है। ED का आरोप है कि 8 जनवरी को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कोयला तस्करी से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में एक छापे को रोका। आरोप है कि वह चुनाव रणनीति संभालने वाली कंपनी I-PAC के डायरेक्टर प्रतीक जैन के घर में घुस गईं और कई दस्तावेज़ हटा दिए। बताया जा रहा है कि उन्होंने फिजिकल दस्तावेज़ और इलेक्ट्रॉनिक सबूत दोनों लिए।
ममता बनर्जी ED की कार्रवाई का कड़ा विरोध कर रही हैं। शुक्रवार को उन्होंने कोलकाता में एक रैली की और केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला। I-PAC तृणमूल कांग्रेस (TMC) की पॉलिटिकल कंसल्टिंग फर्म है। ममता बनर्जी ने ED अधिकारियों को रोकने की कोशिश की, यह दावा करते हुए कि ED ने उनकी पार्टी TMC के हार्ड ड्राइव, दस्तावेज़ और संवेदनशील डेटा ज़ब्त कर लिए हैं। यह भी आरोप है कि वह कुछ दस्तावेज़ अपने साथ ले गईं। दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने खुद ED के खिलाफ FIR दर्ज कराई है।
इस मामले को लेकर कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और झारखंड के मौजूदा मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को ईडी ने गिरफ्तार किया। दोनों को ही महीनों तक न्यायिक हिरासत में रखकर पूछताछ की गई। लेकिन अरविंद केजरीवाल को ईडी ने आबकारी मामले में सीधे आरोपी दिखाया था। जबकि हेमंत सोरेन जमीन धांधली से जुड़े एक मामले में फंसे थे। वहीं, ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल के किसी भी चर्चित घोटाले में सीधे तौर पर आरोपी नहीं हैं।
कानूनी जानकारों का यह भी कहना है कि ईडी की कार्रवाई अभी तक उनके मंत्रियों और करीबियों तक ही सीमित रही है। किसी भी राज्य के मुखिया की गिरफ्तारी के लिए ईडी को सीधे मनी ट्रेल और पुख्ता सबूतों की जरूरत होती है। बंगाल की सीएम ममता बनर्जी के खिलाफ ऐसा कोई सुबूत फिलहाल नहीं है। इसके साथ ही वह सड़क और अदालत, दोनों स्तरों पर केंद्रीय जांच एजेंसियों के खिलाफ खड़ी रही हैं। हां! ममता बनर्जी पर ईडी ने जांच में बाधा डालने का आरोप लगाया है, जिस पर अभी कोर्ट में सुनवाई होनी है।
दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल सरकार ने साल 2018 में एक बड़ा कदम उठाते हुए CBI को दी गई आम सहमति वापस ले ली थी। जिसके चलते अब CBI को राज्य में कोई नया केस दर्ज करने या जांच करने के लिए हर बार राज्य सरकार से खास अनुमति लेनी पड़ती है। ममता का आरोप है कि सहमति वापस लेने के बावजूद केंद्र सरकार CBI को राज्य में जांच करने की इजाजत दे रही है। पश्चिम बंगाल सरकार ने इसे संविधान का उल्लंघन और संघीय ढांचे पर हमला माना है। इसी परिप्रेक्ष्य में राज्य ने 2021 में सुप्रीम कोर्ट में एक ओरिजिनल सूट भी दायर किया था।
गौरतलब है कि CBI का गठन दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम (DSPE Act), 1946 के तहत हुआ था। इस अधिनियम की धारा 6 कहती है कि सीबीआई को किसी भी राज्य के अधिकार क्षेत्र में जांच करने के लिए उस राज्य सरकार की सहमति जरूरी है। आम तौर पर राज्य सरकारें केंद्रीय एजेंसी को एक ‘सामान्य सहमति’ देकर रखती हैं, जिससे वे जांच कर सकें। लेकिन नवंबर 2018 में ममता बनर्जी सरकार ने यह ‘सामान्य सहमति’ वापस ले ली थी। अब सीबीआई को हर बार पश्चिम बंगाल सरकार से इजाजत लेने की जरूरत पड़ती है।’
ममता बनर्जी ED-CBI से क्यों नहीं डरतीं? (इन्फोग्राफिक-AI)
विधि विशेषज्ञों के मुताबिक, भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत’ पुलिस’ और ‘लोक व्यवस्था’ राज्य सूची का हिस्सा है। इसलिए बिना राज्य की इजाजत के केंद्रीय एजेंसी हस्तक्षेप नहीं करती हैं। पश्चिम बंगाल सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 131 के तहत सुप्रीम कोर्ट में केंद्र के खिलाफ मुकदमा भी दायर किया है। हालांकि इस मुद्दे पर अभी सुप्रीम कोर्ट की निर्णायक टिप्पणी नहीं आई है।
हालांकि, ईडी चाहे तो ममता बनर्जी सरकार की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। CBI जांच के लिए राज्य की सहमति चाहिए। ईडी जांच के लिए राज्य की सहमति अनिवार्य नहीं है। ईडी ‘प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट 2002’ के तहत काम करती है। यह एक केंद्रीय कानून है जो पूरे भारत में प्रभावी है। यही वजह कि ममता बनर्जी सीबीआई को तो रोक पाती हैं, लेकिन ईडी एक्शन को सीधे तौर पर नहीं रोक पातीं हैं।
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आपको यह भी जानकारी देते चलें कि जिन मामलों में जांच के आदेश सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट की तरफ से जारी होते हैं, उनमें सरकार की सहमति जरूरी नहीं होती है। इसके साथ ही जो मामले जनरल कंसेंट से पहले दर्ज हुए होते हैं उनमें भी सरकार की मंजूरी लिए बिना जांच हो सकती है।
पश्चिम बंगाल के अलावा भी कई राज्यों ने सीबीआई जांच के लिए आम सहमति वापस ली है। अधिकतर गैर बीजेपी शासित राज्यों में अब सीबीआई जांच के लिए आम सहमति नहीं है। पंजाब, झारखंड, केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल, उन्हीं राज्यों में शामिल हैं। कर्नाटक में भी सिद्धारमैया सरकार ने 2024 में आम सहमति वापस ले ली थी। इसके अलावा तेलंगाना में बीआरएस के शासनकाल में ही आम सहमति वापस हो गई थी।
Ans: ममता बनर्जी पर आरोप है कि उन्होंने कोयला तस्करी से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में ED की कार्रवाई में हस्तक्षेप किया और I-PAC से जुड़े दस्तावेज़ व इलेक्ट्रॉनिक सबूत हटाए। इसी आरोप को लेकर ED और ममता बनर्जी के बीच टकराव बढ़ा है।
Ans: CBI को किसी राज्य में जांच के लिए राज्य सरकार की सहमति चाहिए, जिसे पश्चिम बंगाल सरकार ने 2018 में वापस ले लिया था। जबकि ED एक केंद्रीय कानून PMLA के तहत काम करती है, इसलिए उसे राज्य सरकार की सहमति की जरूरत नहीं होती।
Ans: कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक किसी मुख्यमंत्री की गिरफ्तारी के लिए ED को सीधे मनी ट्रेल और ठोस सबूत दिखाने होते हैं। फिलहाल ममता बनर्जी किसी घोटाले में सीधे आरोपी नहीं हैं, हालांकि जांच में बाधा डालने के आरोप पर कोर्ट में सुनवाई होनी बाकी है।






