प्रस्ताव में कहा गया है कि इसे(यूसीसी) लागू करना और मुस्लिम पर्सनल लॉ को समाप्त करना धार्मिक अधिकारों का खुला उल्लंघन है तथा मुस्लिम पारिवारिक कानूनों को समाप्त करने का प्रयास लोकतंत्र की भावना और भारत के संविधान में प्रदत्त गारंटी के खिलाफ है। प्रस्ताव के मुताबिक, यूसीसी केवल मुसलमानों की समस्या नहीं है, बल्कि इसका संबंध देश के विभिन्न सामाजिक समूहों, समुदायों, जातियों और सभी वर्गों से है। इसमें कहा गया है, “हमारा देश अनेकता में एकता का सर्वोच्च उदाहरण है, हमारे बहुलतावाद की अनदेखी करके जो भी कानून बनाया जाएगा, उसका सीधा असर देश की एकता और अखंडता पर पड़ेगा।”