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पंडित राम प्रसाद बिस्मिल: मेरा रंग दे बसंती चोला गीत से युवाओं में आज़ादी की अलख जगाने वाले महान स्वतंत्र सेनानी
- Written By: किर्तेश ढोबले

नई दिल्ली: 19 दिसंबर 1927 को सुबह छह बजे काकोरी कांड के नायक पंडित राम प्रसाद बिस्मिल को गोरखपुर जेल में फांसी दी जानी थी। फांसी दिए जाने से कुछ ही घंटे पहले पंडित राम प्रसाद बिस्मिल को कसरत करते देख वहां के जेलर और पहरा चौंक गए थे। उस समय जेलर उनसे पूछा था कि पंडित- तुम्हें तो कुछ देर में ही फांसी होनी है। फिर यह कसरत क्यों? जिस पर पंडित जी ने जवाब दिया था कि यह भारत माता की चरणों में अर्पित होने वाला फूल है। मुरझाया हुआ नहीं होना चाहिए। स्वस्थ व सुंदर दिखना चाहिए।
अपनी सोच से अंग्रेजी हुकूमत की नक्को में दम करने वाले पंडित राम प्रसाद बिस्मिल की आज पुण्यतिथि है। 30 वर्ष की उम्र में देश की आजादी के लिए खुद को समर्पित करने वाले अमर शहीद राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ का जन्म 11 जून 1897 में उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में हुआ था। मैनपुरी व काकोरी काण्ड जैसी कई घटनाओं के प्रमुख किरदार राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ स्वतंत्रता आंदोलन में क्रांति की धारा के प्रमुख अंग थे। उनका भारत की आजादी में काफ़ी योगदान रहा है।
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वह क्रांतिकारियों के बीच अहम भूमिका निभाते हुए वह एक प्रमुख चहरा बनकर उभरे थे। पंडित एक अव्वल लेखक, साहित्यकार, इतिहासकार और बहुभाषी अनुवादक थे। इतनी कुशलता के बावजूद उन्होंने युवाओं को क्रांति के लिए प्रेरित करने पर ज्यादा ध्यान दिया और उसमें सफल भी हुए। इतिहासकार के रूप में उनका परिचय गहरा और विराट है।
पंडित राम प्रसाद बिस्मिल ने सन् 1916 में 19 वर्ष की उम्र में ही क्रांति मार्ग पर कदम रखा था। उन्होंने 30 वर्ष की उम्र तक 11 सालों के दौरान उन्होंने कई पुस्तकें लिखीं और स्वयं ही उन्हें प्रकाशित किया। ऐसा भी उल्लेख किया जाता है कि अपनी किताबों के बिक्री से मिले पैसों से उन्होंने ब्रिटिश राज में क्रांति जारी रखने के लिए हथियार खरीदे। उनके पूरे जीवन का मकसद केवल आजादी था। वह अपने अन्य साथियों की तरह आजादी की तमन्ना में जिए और फिर उस चाहत को पूरा करने की दिशा में प्राण न्योछावर कर दिए।
काकोरी कांड
काकोरी कांड के बारें में तो आपने सुना ही होगा। उत्तर प्रदेश के लखनऊ के पास मौजूद काकोरी की ट्रेन को पंडित और उनके तीन साथियों ने लूटा और ब्रिटिश साम्राज्य के गार्ड्स को चकमा देकर ट्रेजरी में मौजूद पैसों को भी लूट लिया था। जिसकी वजह से अंग्रेजी हुकूमत ने पंडित और उनके 3 साथियों को गिरफ्तार कर लिया और बाद में उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई।
काकोरी कांड के बाद पंडित पर मुकदमा दायर हो चुका था। फिर भी वह ब्रिटिश साम्राज्य के विरूद्ध क्रांति जारी रखना चाहते थे। जिसके लिए उनका जेल से बाहर आना आवश्यक था। जेल से छुड़ा लेने के प्रयासों में देरी देख बिस्मिल ने जेल के भीतर से एक ग़ज़ल लिख कर उलाहना भेजा था। मजिस्ट्रेट ने इसे इश्क़ का पैगाम समझ कर बाहर भेजने की अनुमति दे दी थी। जो उनकी अंतिम रचना थी। उन्होंने लिखा।
पंडित राम प्रसाद बिस्मिल रचित अंतिम कविता :
[blockquote content=” मिट गया जब मिटने वाला फिर सलाम आया तो क्या,
दिल की बर्बादी के बाद उनका पयाम आया तो क्या?
मिट गईं जब सब उम्मीदें मिट गए जब सब ख़याल,
उस घड़ी गर नामावर लेकर पयाम आया तो क्या?
ऐ दिले-नादान मिट जा तू भी कू-ए-यार में ,
फिर मेरी नाकामियों के बाद काम आया तो क्या?
काश! अपनी जिंदगी में हम वो मंजर देखते,
यूँ सरे-तुर्बत कोई महशर-खिराम आया तो क्या?
आख़िरी शब दीद के काबिल थी ‘बिस्मिल’ की तड़प,
सुब्ह-दम कोई अगर बाला-ए-बाम आया तो क्या?” pic=”” name=””]
मेरा रंग दे बसंती चोला
पंडित ने लखनऊ के सेंट्रल जेल में अपनी आत्मकथा लिखी थी। जिसे साहित्य के इतिहास में एक स्थान दिया गया है। जेल में ही उन्होंने मशहूर गीत ‘मेरा रंग दे बसंती चोला’ भी लिखा था। फांसी से पहले भी उनके आखिरी शब्द ‘जय हिंद’ थे। उन्हें 19 दिस्मबंर 1927 को उन्हें फांसी दी गई और रपती नदी के पास उनका अंतिम संस्कार किया गया। बाद में उस जगह को राज घाट के नाम से जाना जाने लगा।
The great freedom fighter who awakened the spirit of freedom among the youth with the song bismil mera rang de basanti chola
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