AMU (Image- Social Media)
नई दिल्ली: अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के अल्पसंख्यक दर्जे को लेकर आज सुप्रीम कोर्ट फैसला सुना सकता है। इस फैसले को लेकर विश्वविद्यालय में तरह-तरह की चर्चाएं हो रही हैं। यूनिवर्सिटी के शिक्षक, विद्यार्थी तथा कर्मचारियों से लेकर पूर्व छात्रों में भी इस फैसले को लेकर हलचल मची हुई है।
साल 1981 में एएमयू संस्थान अल्पसंख्यक स्वरूप की बहाली के बाद साल 2004 में मनमोहन सिंह की सरकार की तरफ से एक पत्र में कहा गया कि यह एक अल्पसंख्यक संस्थान है। इसलिए अपनी दाखिला नीति में वह परिवर्तन कर सकता है। तत्कालीन केंद्र सरकार की इजाजत के बाद विश्वविद्यालय ने साल 2004 में एमडी–एमएस के विद्यार्थियों के लिए प्रवेश नीति बदलाव करके आरक्षण प्रदान किया।
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को अल्पसंख्यक दर्जे के खिलाफ पंडित डॉ नरेश अग्रवाल और अन्य लोगों ने इलाहबाद हाईकोर्ट का रुख किया। जहां सुनवाई के दौरान एकल पीठ का फैसला अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के खिलाफ आया। दो जजों की पीठ का फैसला भी विश्वविद्यालय के खिलाफ था। उसके बाद विश्वविद्यालय ने सर्वोच्च न्यायालय की शरण ली, जहां आदेश दिया गया कि जब तक कोई सबूत नहीं मिलता तब तक यथास्थिति बनी रहेगी, लेकिन भीजपा सरकार ने एएमयू के पक्ष में दाखिल किओए गओए हलफनामे को चुनौती दी।
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जिसके बाद सर्वोच्च अदालत की संविधान पीठ, जिसमें जस्टिस संजीव खन्ना, सूर्यकांत, जेबी पार्डीवाला, दीपांकर दत्ता, मनोज मिश्रा तथा सतीश चंद्र शर्मा भी शामिल हैं, इस मामले की सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान सभी पक्षों ने अपनी दलीलें दी। सुनवाई के बाद संविधान पीठ ने एक फरवरी को इस मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया था। बता दें कि संविधान के अनुच्छेद 30 के तहत अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को अल्पसंख्यक दर्जा प्राप्त है।
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