शब्बीर शाह, फोटो- सोशल मीडिया
Shabbir Ahmed Shah Bail Supreme Court: आज यानी गुरुवार, 12 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर के प्रमुख अलगाववादी नेता शब्बीर अहमद शाह को एक बड़े टेरर फंडिंग मामले में जमानत देने का आदेश सुनाया। साल 2019 से सलाखों के पीछे बंद शाह के लिए यह फैसला एक बड़ी कानूनी राहत के रूप में देखा जा रहा है।
यह मामला केवल एक व्यक्ति की रिहाई का नहीं है, बल्कि यह अदालती कार्यवाही में होने वाली देरी और विचाराधीन कैदियों के मौलिक अधिकारों पर भी एक गंभीर टिप्पणी पेश करता है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए साफ कर दिया कि न्याय में देरी किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है।
शब्बीर अहमद शाह को राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने 4 जून 2019 को गिरफ्तार किया था और तब से वे लगातार न्यायिक हिरासत में थे। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर विशेष गौर किया कि शाह पिछले 6 सालों से जेल में बंद हैं और अभी तक ट्रायल पूरा नहीं हो पाया है। बेंच ने ट्रायल में सामने आई कुछ अनियमितताओं और विसंगतियों पर भी तीखी टिप्पणी की। अदालत का मानना था कि यदि ट्रायल में इतनी लंबी देरी हो रही है, तो आरोपी को अनिश्चितकाल के लिए जेल में नहीं रखा जा सकता।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि जमानत पूरी तरह बिना शर्त नहीं होगी; विस्तृत आदेश बाद में जारी किया जाएगा और इसमें कुछ अत्यंत सख्त शर्तें शामिल होंगी ताकि सुरक्षा मानकों के साथ कोई समझौता न हो।
सुप्रीम कोर्ट पहुंचने से पहले शब्बीर शाह ने दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन वहां उन्हें निराशा हाथ लगी थी। साल 2025 में दिल्ली हाईकोर्ट ने उनकी जमानत याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि शाह बाहर निकलकर दोबारा देश विरोधी गतिविधियों में शामिल हो सकते हैं और वे गवाहों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।
हाईकोर्ट के इसी फैसले को चुनौती देते हुए शाह ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के तर्क को सुना लेकिन अंततः ट्रायल में हो रही असाधारण देरी को आरोपी के पक्ष में एक मजबूत आधार माना और उन्हें जमानत की मंजूरी दे दी।
NIA द्वारा दर्ज किए गए इस मामले में शब्बीर शाह पर लगे आरोप बेहद गंभीर और संवेदनशील हैं। जांच एजेंसी के अनुसार, शाह पर जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी आंदोलनों को बढ़ावा देने और लोगों को भारत के खिलाफ भड़काने के लिए उकसाने का आरोप है।
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उन पर यह भी आरोप लगाया गया था कि उन्होंने पाकिस्तान और अन्य स्रोतों से ‘हवाला’ नेटवर्क और ‘LoC पार व्यापार’ के जरिए भारी मात्रा में फंड जुटाया था। NIA के मुताबिक, इस पैसे का इस्तेमाल घाटी में पत्थरबाजी करवाने, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और भारत के खिलाफ बड़ी साजिशें रचने के लिए किया गया। इसके अलावा, उन पर मारे गए आतंकवादियों को शहीद बताकर उनकी तारीफ करने और युवाओं को गुमराह करने के आरोप भी लगे थे।
भले ही सुप्रीम कोर्ट ने शब्बीर शाह को जमानत दे दी है, लेकिन उनकी रिहाई के साथ कई कानूनी बंदिशें जुड़ी होंगी। अदालत ने स्पष्ट किया है कि विस्तृत आदेश में ऐसी शर्तें लगाई जाएंगी जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि वे न तो गवाहों से संपर्क करेंगे और न ही देश की सुरक्षा के लिए कोई खतरा पैदा करेंगे।