सुप्रीम कोर्ट (सोर्स: सोशल मीडिया)
What is Passive Euthanasia: गाजियाबाद के 31 वर्षीय हरीश राणा के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छा-मृत्यु का ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। हरीश राणा के पिता अशोक राणा और मां निर्मल राणा पिछले कई वर्षों से सुप्रीम कोर्ट से यह फैसला सुनाने के लिए बार-बार दस्तक दे रहे थे, लेकिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला सुनाने के लिए मना कर दिया, मगर 11 मार्च 2026 को जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथ की बेंच ने एम्स को ऐतिहासिक निर्देश दिया कि हरीश राणा के लाइफ सपोर्ट सिस्टम को धीरे-धीरे चरणबद्ध तरीके से हटा लिया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में इस बात पर जोर दिया कि यह प्रक्रिया इस तरह से संपन्न होनी चाहिए कि मरीज की मृत्यु की गरिमा बनी रहे।
दिल्ली में जन्मे हरीश राणा चंडीगढ़ की पंजाब यूनिवर्सिटी से बीटेक की पढ़ाई कर रहे थे। 2013 में वह होस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए या उन्हें किसी ने गिरा दिया। गिरने की वजह से उनके पूरे शरीर को लकवा मार गया और वह कोमा में चले गए। तब से ही वह न कुछ बोल सकते थे और न ही कुछ महसूस करते थे। डॉक्टरों ने हरीश को क्वाड्रिपलेजिया बीमारी से पीड़ित बताया था। इससे मरीज पूरी तरह से फीडिंग ट्यूब यानी खाने पीने की नली और वेंटीलेटर सपोर्ट पर निर्भर रहता है। इस स्थिति से रिकवरी की कोई गुंजाइश नहीं होती।
13 साल से बिस्तर पर पड़े होने के कारण हरीश के शरीर पर ‘बेड सॉर्स’ यानी गहरे घाव बन गए थे। उनकी हालत लगातार बदतर होती जा रही थी। यह स्थिति न केवल हरीश के लिए बेहद दर्दनाक बल्कि उनका परिवार भी पूरी तरह से टूट गया। बेटे के इलाज के लिए पिता दिल्ली स्थित अपना मकान बेचकर गाजियाबाद में एक कमरे के फ्लैट में शिफ्ट हुए।
हरीश राणा केस में सुप्रीम कोर्ट ने 4 निर्देश दिए। मरीज को दी जा रही चिकित्सा सहायता को वापस लिया या रोका जा सकता है, इस मामले में सामान्यतः लागू 30 दिन की पुनर्विचार अवधि को माफ कर दिया गया और एम्स को निर्देश दिया गया कि मरीज को पेलिएटिव केयर सेंटर में भर्ती किया जाए, ताकि धीरे-धीरे इलाज प्रक्रिया पूरी हो सके। पेलिएटिव केयर वह व्यवस्था होती है, जिसमें मरीजों को आराम देने के लिए चिकित्सा व्यवस्था धीरे-धीरे रोकी जाती है। हरीश राणा फिलहाल घर में हैं और उन्हें अस्पताल शिफ्ट किए जाने की पूरी व्यवस्था सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक एम्स करेगा और फिर एक विशेष चिकित्सा योजना के तहत उन्हें लाइफ सपोर्ट सिस्टम से अलग किया जाएगा।
भारत में पहली बार इच्छा-मृत्यु की औपचारिक मांग 2010 में सुप्रीम कोर्ट में मुंबई के केईएम अस्पताल की नर्स अरुणा शानबाग के लिए की गई थी, जिन पर 1973 में अस्पताल के ही एक कर्मचारी ने यौन हमला करके उसका गला घोंट दिया था। इससे उन्हें गंभीर मस्तिष्क क्षति हुई थी और वह स्थायी रूप से अचेत अवस्था में चली गई थीं।
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लगभग 37 से 42 साल तक बेहोशी की स्थिति में जीवित रहीं। अरुणा शानबाग के लिए 2010 में मशहूर पत्रकार और लेखिका पिंकी विरानी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी और देश की सर्वोच्च अदालत से अनुरोध किया था कि उन्हें कृत्रिम जीवन रक्षक व्यवस्था से मुक्त कर दिया जाए। सुप्रीम कोर्ट को यह मांग स्वीकार नहीं थी, इसे ठुकरा दिया था। अदालत ने कहा था कि संविधान अनुच्छेद 21 के तहत जीवन का अधिकार देता है और राज्य का कर्तव्य है कि वह अपने नागरिकों की जीवन की रक्षा करे। हालांकि अरुणा शानबाग के लिए सुप्रीम कोर्ट के द्वारा इच्छा-मृत्यु याचिका को तो स्वीकार नहीं किया गया, मगर उसी फैसले से एक बड़ा रास्ता भी खुला।
जब सुप्रीम कोर्ट ने माना कि विशेष परिस्थितियों में पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छा-मृत्यु की इजाजत दी जा सकती है। कोर्ट ने अपने तत्कालीन फैसले में कहा था, ‘अगर मरीज स्थायी रूप से अचेत अवस्था में हो, ठीक होने की कोई संभावना न हो तो परिवार हाईकोर्ट से अनुमति लेकर जीवन रक्षक उपकरण हटवा सकता है। यही भारत में इच्छा-मृत्यु की पहली कानूनी मान्यता का आधार बनीं। भारत में अभी तक इच्छा-मृत्यु की इजाजत गैरकानूनी थी और इसमें नैतिक विवाद चल रहा था। इस फैसले के बाद अब नैतिक विवाद का मामला खत्म हो जाएगा।
लेख- वीना गौतम के द्वारा