सुप्रीम कोर्ट (Image- Social Media)
Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जताई है, जिसमें सरकारी जमीन पर बने या सरकारी रियायतों के आधार पर संचालित निजी अस्पतालों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) और गरीबी रेखा से नीचे (BPL) जीवन यापन करने वाले लोगों को मुफ्त इलाज दिए जाने की मांग की गई है। चीफ जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली बेंच ने 29 अगस्त को इस जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार, सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को नोटिस जारी किया है।
यह याचिका मैग्सेसे अवॉर्ड से सम्मानित और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता संदीप पांडेय द्वारा दाखिल की गई है। याचिका में तर्क दिया गया है कि इन निजी अस्पतालों को सार्वजनिक भूमि रियायती दर पर इस शर्त पर दी गई थी कि वे EWS/BPL श्रेणी के मरीजों को मुफ्त इलाज मुहैया कराएंगे, लेकिन उन्होंने इन शर्तों का उल्लंघन किया है।
जनहित याचिका में कहा गया है कि राज्य सरकारें बार-बार की गई ऑडिट रिपोर्टों, न्यायालय-निरीक्षण वाली जांचों और सरकारी अधिसूचनाओं के बावजूद यह सुनिश्चित करने में विफल रही हैं कि अस्पताल तयशुदा मुफ्त इलाज (आमतौर पर 10% इनपेशेंट बेड और 25% आउट पेशेंट कंसल्टेशन) की व्यवस्था का पालन करें। उदाहरणस्वरूप दिल्ली के कई अस्पतालों को यह शर्त दी गई थी कि वे अपने एक-तिहाई बिस्तर मुफ्त इलाज के लिए आरक्षित रखें। इस निर्देश के पालन न होने पर दिल्ली हाईकोर्ट ने सोशल जुरिस्ट बनाम GNCTD (2007) में अधिकारियों को लापरवाही पर फटकार लगाई और दंडित करने का निर्देश भी दिया, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी कायम रखा।
इसी तरह महाराष्ट्र की 2016 की CAG रिपोर्ट में व्यापक स्तर पर अनियमितताओं का पता चला। प्रमुख अस्पतालों ने अतिरिक्त FSI (फ्लोर स्पेस इंडेक्स) मिलने के बावजूद, निर्धारित मुफ्त सेवाओं का केवल आधा हिस्सा ही दिया। हरियाणा में 2018 में बनी एक समिति की रिपोर्ट ने बताया कि लगभग दस वर्षों तक किसी भी निगरानी बैठक का आयोजन नहीं हुआ। एक अस्पताल ने 2017 में भर्ती 64,000 मरीजों में से केवल 118 EWS मरीजों का मुफ्त इलाज किया। ओडिशा की 2013-14 की CAG रिपोर्ट में सामने आया कि जिन अस्पतालों को ₹45.68 करोड़ मूल्य की जमीन रियायती दर पर दी गई थी, उन्होंने मुफ्त इलाज की शर्तों को नजरअंदाज किया।
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याचिका में यह भी आरोप है कि कई राज्यों में गरीबों के लिए निजी अस्पतालों में मुफ्त इलाज की व्यवस्था को लागू करने में गंभीर विफलता रही है, जिसके चलते समाज के कमजोर तबकों को उनके हक की स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित रहना पड़ा। याचिका में मांग की गई है कि सभी राज्यों में एक समान नीति या लीज शर्तें लागू की जाएं, जिसके तहत सार्वजनिक जमीन पर बने अस्पतालों को मुफ्त इलाज अनिवार्य रूप से देना होगा। इसके साथ ही हर राज्य और केंद्रशासित प्रदेश में एक मजबूत निगरानी संस्था का गठन किया जाए, नियमित सार्वजनिक रिपोर्टिंग की व्यवस्था हो और उल्लंघन की स्थिति में सख्त कार्रवाई की जाए।