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सुप्रीम कोर्ट में न्याय की जंग, क्या संविधान तय करेगा धर्म का स्वरूप? 9 जजों के सामने वकीलों की तीखी दलीलें
- Written By: मनोज आर्या
Supreme Court: जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने एसजी की दलीलों पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक नैतिकता स्थिर नहीं है जो 1950 के दशक में अनैतिक या अश्लील माना जाता था, वह आज वैसा नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट, (सोर्स- सोशल मीडिया)
Supreme Court Hearing On Sabarimala Case: सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संवैधानिक पीठ ने बुधवार को ‘धर्म बनाम कानून’ मामले में दूसरे दिन की सुनवाई की। सुनवाई की शुरुआत वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के बीच समय आवंटन को लेकर हुई तीखी बहस से हुई। धवन ने सरकार की ओर से दी जा रही लंबी दलीलों पर आपत्ति जताते हुए कहा कि अगर सारा वक्त एसजी ही लेंगे तो याचिकाकर्ताओं को अपनी बात रखने का मौका नहीं मिलेगा।
इस पर पीठ ने सभी वरिष्ठ वकीलों को पर्याप्त वक्त देने का आश्वासन दिया। एसजी तुषार मेहता ने अपनी दलील जारी रखते हुए कहा कि धर्मनिरपेक्ष अदालतें ये तय नहीं कर सकतीं कि अनिवार्य धार्मिक प्रथा क्या है, क्योंकि वो धार्मिक विद्वान नहीं हैं। उन्होंने तर्क दिया कि वास्तविक धर्मनिरपेक्षता वह है, जहां राज्य धर्म में हस्तक्षेप न करे और धर्म राज्य में दखल न दे। बेंच ने इस पर सवाल उठाते हुए नैतिकता और संवैधानिक मूल्यों की बदलती परिभाषाओं पर चर्चा की।
सुनवाई के दौरान वकीलों के बीच विवाद
सुनवाई शुरू होते ही राजीव धवन ने कोर्ट के सामने वक्त का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि अगर याचिकाकर्ताओं के लिए तय तीन दिनों की समयसीमा पर गिलोटिन गिरनी है तो बाकी वकीलों को घर चले जाना चाहिए। धवन और सॉलिसिटर जनरल के बीच छोटा विवाद भी हुआ, जिसमें धवन ने SG से कहा कि चुप रहिए और बीच में मत टोकिए। इस पर मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने स्पष्ट किया कि अप्रैल में सुनवाई इसलिए रखी गई है, ताकि गर्मियों की छुट्टियों के दौरान बेंच के पास सभी डॉक्यूमेंट्स को पढ़ने का समय रहे।
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‘आस्था में अदालतों के हस्तक्षेप ठीक नहीं’
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि अदालतों को आस्था के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। उन्होंने विभिन्न राज्यों के धार्मिक बंदोबस्त अधिनियमों (Religious Endowments Acts) का हवाला देते हुए कहा कि पुजारियों की नियुक्ति की शक्ति राज्य को देना सिद्धांतों का उल्लंघन है। एसजी के अनुसार, धार्मिक संप्रदायों को परिभाषित करना ‘अपरिभाषित को परिभाषित’ करने जैसा है। उन्होंने शिरडी साईं बाबा और तिरुपति जैसे उदाहरण देकर बताया कि जहां हर वर्ग के लोग आते हैं, वहां संप्रदाय की सख्त परिभाषा लागू नहीं हो सकती।
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने क्या कहा?
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने एसजी की दलीलों पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि ‘सार्वजनिक नैतिकता’ स्थिर नहीं है जो 1950 के दशक में अनैतिक या अश्लील माना जाता था, वह आज वैसा नहीं है। उन्होंने सवाल किया कि क्या हम 50 के दशक के मानकों को संकीर्ण मानसिकता कह सकते हैं? जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि समाज के साथ नैतिकता बदलती रहती है, इसलिए इसे केवल एक पुराने नजरिए से नहीं देखा जा सकता।
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जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने एसजी के उस तर्क को खारिज कर दिया जिसमें उन्होंने कहा था कि संवैधानिक नैतिकता न्यायिक समीक्षा का आधार नहीं हो सकती। जस्टिस बागची ने अनुच्छेद 25 का जिक्र करते हुए कहा कि इसमें ‘अंतरात्मा की स्वतंत्रता’ शब्द का इस्तेमाल किया गया है। उन्होंने कहा कि यदि नागरिकों का एक वर्ग संवैधानिक नैतिकता से शासित होना चाहता है तो उसे अनुमति मिलनी चाहिए, भले ही वह समाज के दूसरे वर्गों की अंतरात्मा को प्रभावित न करे।
Supreme court 9 judge bench hearing on sabarimala temple case
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