शरीर पर 80 घाव और एक आंख, फिर भी थर-थर कांपते थे दुश्मन! जानिए उस योद्धा का कहानी जिसने बाबर को चटाई थी धूल

Rajasthan News: मेवाड़ के महाराणा सांगा भारतीय इतिहास के वह अदम्य योद्धा थे, जिन्होंने 80 घाव और शरीर के अंग खोने के बावजूद मुगलों और लोदी से लोहा लिया। उनकी वीरता की गौरवगाथा आज भी प्रेरित करती है।
Rana Sanga Birth Anniversary
राणा सांगा (सोर्स- सोशल मीडिया)
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Rana Sanga Birth Anniversary: राणा सांगा... यह नाम राजस्थान की वीरता की सबसे बड़ी मिसाल बनकर इतिहास में गूंजता है। वे केवल एक शासक नहीं थे, बल्कि एक ऐसे योद्धा थे जिन्होंने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए न केवल मेवाड़, बल्कि सम्पूर्ण भारत को विदेशी आक्रमणकारियों से बचाने का अडिग संकल्प लिया था। 1509 से 1527 तक मेवाड़ की गद्दी पर आसीन राणा सांगा का जीवन युद्ध और संघर्ष से भरा था। उनके दिल में कभी भी सत्ता का लोभ नहीं था, बल्कि उनका एकमात्र उद्देश्य अपनी मातृभूमि की स्वतंत्रता की रक्षा करना था।

राणा सांगा का संघर्ष मुख्य रूप से बाबर और मुगलों के खिलाफ था, जो उस समय भारतीय उपमहाद्वीप में अपनी शक्ति फैलाने में लगे हुए थे। वे मध्यकालीन भारत के उन अंतिम शासकों में से एक थे जिन्होंने अपने समय के सबसे बड़े और खतरनाक शत्रुओं का सामना किया। उनका सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने अपने समकालीन राजपूत शासकों को एकजुट किया और एक सशक्त राजपूत संघ का निर्माण किया, जिसका उद्देश्य मुगलों के विस्तार को रोकना था।

जीवन में लड़ी 100 लड़ाइयां

किंवदंतियों के अनुसार, राणा सांगा ने कुल 100 लड़ाइयां लड़ीं और इनमें से सिर्फ एक ही युद्ध में वे पराजित हुए थे। युद्धों में अपनी वीरता और साहस का परिचय देते हुए उन्होंने शरीर पर 80 घाव और एक हाथ, एक पैर तथा एक आंख खो दी, लेकिन उनके दिल में कभी हार मानने का विचार नहीं आया। राणा सांगा के इस अपार साहस और संघर्ष को देखकर उन्हें भारतीय इतिहास में एक अमिट स्थान मिला है।

खतौली के युद्ध में इब्राहीम लोदी को दी थी मात

1517 में राणा सांगा ने इब्राहीम लोदी के खिलाफ खतौली की प्रसिद्ध लड़ाई लड़ी। इस युद्ध में राणा सांगा की वीरता का सामना करते हुए इब्राहीम लोदी ने युद्ध भूमि छोड़ दी और भाग खड़ा हुआ। हालांकि इस युद्ध में राणा सांगा ने अपने बायें हाथ को खो दिया और उनके घुटने में एक तीर लगने से उनका एक पैर भी घायल हो गया, फिर भी उन्होंने युद्ध जारी रखा। इस संघर्ष में मेवाड़ की सेना ने लोदी राजकुमार को बंदी बना लिया और बाद में उसे फिरौती के आधार पर रिहा कर दिया।

अपनों की साजिश का हुए शिकार

राणा सांगा का जीवन साहस, संघर्ष और बलिदान का प्रतीक था। वह बाबर के खिलाफ एक निर्णायक युद्ध के लिए तैयार हो चुके थे, लेकिन दुर्भाग्य से उनके कुछ सहयोगियों ने ही उन्हें जहर दे दिया। उनके विरोधी यह मानते थे कि राणा सांगा का बाबर के खिलाफ पुनः युद्ध छेड़ने का निर्णय आत्मघाती हो सकता है। इस षड्यंत्र के कारण 30 जनवरी, 1528 को उनका निधन हो गया। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि यदि राणा सांगा जीवित रहते, तो मुगलों का भारतीय उपमहाद्वीप में साम्राज्य फैलाना बहुत कठिन हो जाता। उनका निरंतर संघर्ष अन्य क्षेत्रीय शासकों को भी मुगलों के खिलाफ संघर्ष करने के लिए प्रेरित करता और शायद भारतीय उपमहाद्वीप का इतिहास कुछ और होता। राणा सांगा ने बाबर के खिलाफ दो प्रमुख लड़ाइयाँ लड़ीं। इन दोनों युद्धों में उनका नेतृत्व और साहस अविस्मरणीय रहा।

खानवा युद्ध में बाबर को चटाई धूल

21 फरवरी, 1527 को हुए "खानवा युद्ध" में राणा सांगा ने बाबर के खिलाफ निर्णायक संघर्ष लड़ा था। इस युद्ध में राणा सांगा की सेनाएँ बाबर की सेना से मुकाबला करने में सफल रही थीं। इस युद्ध के बाद राणा सांगा ने बाबर के शिविर पर कब्जा कर लिया था और वहां से बहुमूल्य सामग्रियाँ जैसे हथियार, गोला-बारूद, संगीत वाद्ययंत्र और यहां तक कि बाबर के तंबू तक लूट लिए थे। ये सभी सामग्रियां आज भी उदयपुर के संग्रहालयों में प्रदर्शित की जाती हैं, जो राणा सांगा की वीरता की गवाह हैं।

राणा सांगा का जीवन एक महाकाव्य था एक ऐसी कहानी जिसमें संघर्ष, बलिदान, साहस और मातृभूमि के प्रति प्रेम की अभिव्यक्ति थी। उनके द्वारा दिखाया गया नेतृत्व और युद्ध कौशल आज भी हर भारतीय के दिल में जीवित है। उनकी वीरता और उनकी अदम्य इच्छा शक्ति ने उन्हें इतिहास में अमर कर दिया। उनके संघर्ष की कहानी आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी। 

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