किताब के लिए सरकार की मंजूरी जरुरी? जिस अफसर पर कांग्रेस काल में दर्ज हुआ मुकदमा...उसी ने खोल दी मोदी की पोल

Major General VK Singh: जनरल नरवणे की किताब विवाद के बीच सवाल ये हैं कि क्या किसी पूर्व सैन्य अधिकारी द्वारा लिखी गई किताब को संबंधित मंत्रालय के पास समीक्षा के लिए भेजा जाना जरूरी है?
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मेजर जनरल वीके सिंह अपनी किताब के साथ (डिजाइन फोटो)
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General MM Naravane Book Controversy: लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की अप्रकाशित किताब का हवाला देते हुए केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को निशाना बनाया। इस पर सत्ता पक्ष ने आपत्ति जताते हुए कहा कि किताब अभी तक प्रकाशित नहीं हुई है इसलिए संसद में इसके किसी भी हिस्से पर चर्चा नहीं हो सकती।

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की तरफ से भी नियमों का हवाला देते हुए यही बात दोहराई गई। जिसके बाद संसद में अब तक हंगामा जारी है। हंगामा इसलिए भी है क्योंकि आपत्ति जताते समय सरकार यह बताना भूल गई कि रक्षा मंत्रालय ने जनरल नरवणे की किताब 'फोर स्टार ऑफ डेस्टिनी' के प्रकाशन पर प्रशासनिक रूप से रोक लगा दी है और यह पिछले एक साल से समीक्षा के अधीन है।

किताब पर विवाद ने खड़े किए कई सवाल

अब सवाल ये हैं कि क्या किसी पूर्व सैन्य अधिकारी द्वारा लिखी गई किताब को संबंधित मंत्रालय के पास समीक्षा के लिए भेजा जाना जरूरी है? इससे पहले भी कही ऐसा हुआ है या नहीं? एमएम नरवणे के अलावा किसी और रक्षा क्षेत्र से जुड़े अधिकारी की किताब विवादों में आई है या नहीं? चलिए इन सभी सवालों के जवाब खोजते हैं...

सेनाधिकारी की किताब पर हुआ है विवाद

दरअसल, यह पहली बार नहीं है जब किसी रिटायर्ड वरिष्ठ सैन्य अधिकारी की किताब विवादों में फंसी हो। ऐसे कई मामले पहले भी हो चुके हैं। साल 2002 में रिटायर होने के बाद मेजर जनरल वीके सिंह ने 'इंडियाज एक्सटर्नल इंटेलिजेंस: सीक्रेट्स ऑफ द रिसर्च एंड एनालिसिस विंग' नाम की एक किताब लिखी।

19 साल से लंबित है वीके सिंह का मुकदमा

साल 2007 में इस किताब के प्रकाशित होने के बाद सीबीआई यानी केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने उनके खिलाफ ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट के तहत मामला दर्ज किया। केस दर्ज होने के बाद गुरुग्राम में उनके घर पर छापा मारा गया और उनका कंप्यूटर, पासपोर्ट और डायरी जब्त कर ली गई। आज मेजर जनरल वीके सिंह 81 साल के हैं। वह जमानत पर बाहर हैं, लेकिन अभी तक कोई ट्रायल शुरू नहीं हुआ है, और न ही ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट के तहत उनके खिलाफ कोई अंतिम कार्रवाई की गई है।

Gen. नरवणे की किताब पर कही बड़ी बात

अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक इंटरव्यू में मेजर जनरल सिंह ने कहा कि रिटायर्ड सैन्य अधिकारियों को अपनी किताबों की पांडुलिपियां मंजूरी के लिए रक्षा मंत्रालय को सौंपने का निर्देश देने वाला कोई 'गैग ऑर्डर' कभी जारी नहीं किया गया है। इस दौरान उन्होंने जनरल नरवणे की किताब को लेकर भी बड़ी बात कही।

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जनरल एमएम नरवणे की किताब के साथ राहुल गांधी (सोर्स- सोशल मीडिया)

जनरल एमएम नरवणे की किताब के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, "यह पहली बार है जब मैं सुन रहा हूं कि किसी पब्लिशर ने मंजूरी के लिए किताब की पांडुलिपि रक्षा मंत्रालय को भेजी है।" उन्होंने यह भी कहा कि अगर कभी सावधानी बरतने की जरूरत होती है तो सैन्य अधिकारी खुद तय करता है कि वह अपनी किताब का ड्राफ्ट समीक्षा के लिए जमा करे या नहीं।

किताब के लिए सरकार की मंजूरी जरूरी?

मेजर जनरल सिंह के अनुसार, आर्मी रूल्स 1954 के नियम 21 के तहत केवल सेवारत रक्षा कर्मियों को ही केंद्र सरकार की अनुमति के बिना किताबें प्रकाशित करने से रोका गया है। उन्होंने आगे कहा कि सेंट्रल सिविल सर्विसेज रूल्स 1972, जो रिटायर्ड अधिकारियों द्वारा किताबों के प्रकाशन को नियंत्रित करते हैं, वे इंटेलिजेंस ब्यूरो या सीमा सुरक्षा बल से रिटायर होने वालों पर लागू होते हैं। सशस्त्र बलों से रिटायर होने वाले अधिकारियों पर यह नियम लागू नहीं होता।

वीके सिंह का मामले में अब तक क्या हुआ?

मेजर जनरल सिंह ने इंटरव्यू में अपनी किताब से जुड़े विवाद के बारे में विस्तार से बात की। उन्होंने बताया कि जब उन्होंने किताब में भ्रष्टाचार के कुछ मामलों का जिक्र किया तो वह सिर्फ एक व्हिसलब्लोअर के तौर पर काम कर रहे थे। CBI ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया कि किताब में गोपनीय जानकारी थी जो गोपनीयता के नियमों का उल्लंघन करती है।

साल 2009 में चीफ मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट ने आदेश दिया कि मामले से जुड़े सभी दस्तावेज मेजर जनरल सिंह और उनके वकीलों को दिए जाएं। CBI ने इस आदेश को चुनौती दी और तब से यह मामला पेंडिंग है। पिछले सितंबर में दिल्ली हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया कि जो दस्तावेज देश की संप्रभुता और अखंडता को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसलिए उन्हें CBI द्वारा blackened किया जाएगा। साथ ही दस्तावेजों की समीक्षा सुबह 9 बजे से रात 9 बजे के बीच की जा सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने CBI को जारी किया नोटिस

मेजर जनरल सिंह ने दिल्ली हाई कोर्ट के इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के सामने दलील दी कि उन्हें पिछले 18 सालों से सार्वजनिक हित में लिखी गई एक किताब से जुड़े मुकदमे का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि लंबी कानूनी प्रक्रिया ने उन्हें मानसिक, शारीरिक और वित्तीय परेशानी दी है, जिससे न्याय की अवधारणा कमजोर हुई है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में CBI को नोटिस जारी किया है।

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