'आया राम, गया राम’ से ‘थोक दलबदल’ तक....वो बड़े सियासी 'धोखे' जिनसे हिल गई थी सत्ता की कुर्सी!

Political Defection: 1967 के 'आया राम-गया राम' से शुरू हुआ दलबदल का दौर अब 'थोक विलय' का रूप ले चुका है। जानें हरियाणा के भजनलाल से लेकर शिंदे-सिंधिया तक, कैसे दलबदल ने भारतीय लोकतंत्र की दिशा बदली।
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राघव चड्ढा (Image- Social Media)
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History of Political Defection India: भारतीय राजनीति में दल बदलना कोई नई बात नहीं है। समय-समय पर नेताओं ने विचारधारा और पार्टी निष्ठा से ऊपर उठकर अपने राजनीतिक हितों के अनुसार पाला बदला है। पहले यह प्रक्रिया अक्सर चुनावों के दौरान व्यक्तिगत स्तर पर होती थी, लेकिन अब बड़े पैमाने पर सामूहिक दलबदल देखने को मिल रहा है। आम आदमी पार्टी (AAP) के राज्यसभा सांसदों को लेकर चल रही चर्चा ने इस मुद्दे को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है। राघव चड्ढा ने भी इसे लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय बताते हुए सवाल उठाया है कि क्या दलबदल अब एक संगठित रणनीति बन चुका है।

‘आया राम, गया राम’ से हुई थी शुरुआत

दलबदल की राजनीति की शुरुआत 1967 में मानी जाती है, जब हरियाणा के विधायक गया लाल ने महज कुछ घंटों में तीन बार पार्टी बदली। इसी घटना से ‘आया राम, गया राम’ मुहावरा प्रचलित हुआ। 1967 से 1971 के बीच लगातार दलबदल के कारण कई राज्य सरकारें गिर गईं, जिससे राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी।

केंद्र की राजनीति पर असर

आपातकाल के बाद 1977 में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में बनी जनता पार्टी सरकार भी अंदरूनी कलह और दलबदल का शिकार हो गई। चौधरी चरण सिंह अलग होकर नई पार्टी बना ली और कांग्रेस के समर्थन से प्रधानमंत्री बने, लेकिन समर्थन वापसी के चलते उनकी सरकार ज्यादा समय नहीं चल सकी।

‘रातों-रात’ दलबदल की बनी थी मिसाल

1980 में हरियाणा के मुख्यमंत्री भजनलाल ने अपने पूरे मंत्रिमंडल और विधायकों के साथ पार्टी बदल ली। इस घटना ने राजनीतिक नैतिकता पर सवाल उठाए और आगे चलकर कानून बनाने की जरूरत महसूस हुई।

दलबदल कानून और उनमें संशोधन

1985 में दलबदल विरोधी कानून लागू किया गया, जिसे बाद में 2003 में 91वें संविधान संशोधन के जरिए और सख्त किया गया। अब किसी दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्य एक साथ अलग होते हैं, तभी उसे वैध माना जाता है। इसके बावजूद राजनीतिक दलों ने नए तरीके निकाल लिए, जैसे वोटिंग के दौरान अनुपस्थित रहना।

‘वोट के बदले नोट’ का विवाद

1993 में पी.वी. नरसिम्हा राव सरकार पर अविश्वास प्रस्ताव के दौरान रिश्वत के आरोप लगे। शिबू सोरेन से जुड़े इस मामले ने संसद की साख पर गंभीर सवाल खड़े किए। 2000 के बाद भी ये सिलसिला जारी रहा। मनमोहन सिंह सरकार के समय 2008 में परमाणु करार पर विश्वास मत के दौरान भी दलबदल और ‘मैनेजमेंट’ की राजनीति देखने को मिली।

राज्यों में ‘थोक दलबदल’

हाल के वर्षों में कई राज्यों में बड़े पैमाने पर दलबदल हुआ-

  • एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में 2022 में महाराष्ट्र सरकार गिरी
  • ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ 2020 में मध्य प्रदेश सरकार बदली
  • कर्नाटक, गोवा और अरुणाचल में भी इसी तरह के घटनाक्रम सामने आए

क्या दलबदल अब नया 'सियासी मॉडल' है?

भारतीय राजनीति में दलबदल की यह प्रवृत्ति समय के साथ बदलती रही है। ‘आया राम-गया राम’ से शुरू हुआ यह दौर अब ‘थोक दलबदल’ में बदल चुका है। कानून बनने और सख्ती बढ़ने के बावजूद इसके नए रास्ते निकलते रहे हैं।

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