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आपातकाल: इंदिरा गांधी-जस्टिस सिन्हा और इलाहाबाद हाई कोर्ट के रूम नं- 24 की कहानी
आज आपातकाल की 50वीं बरसी है। इमरजेंसी की घोषणा 25 जून 1975 को की गई थी। लेकिन इसकी नींव 13 दिन पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट के कमरा नंबर 24 में डाली गई थी।
- Written By: अभिषेक सिंह

इंदिरा गांधी, जस्टिस सिन्हा और इलाहाबाद हाई कोर्ट (डिजाइन फोटो)
नई दिल्ली: भारतीय लोकतंत्र के सफेद दामन पर 50 साल पहले आज ही के दिन यानी 25 जून को कभी न मिटने वाला बदनुमा दाग लगा था। जी हां! आज आपातकाल की 50वीं बरसी है। इमरजेंसी की घोषणा 25 जून 1975 को की गई थी। लेकिन इसकी नींव उससे 13 दिन पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट के कमरा नंबर 24 में डाली गई थी।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के तत्कालीन जज जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने 12 जून 1975 को ऐसा फैसला दिया जिसने देश की राजनीति की दिशा बदल दी थी। स्वंतंत्र भारत में यह पहला अवसर था जब किसी प्रधानमंत्री का चुनाव अवैध करार दे दिया गया था। इमरजेंसी के 50 साल पूरे होने के मौके पर जस्टिस सिन्हा के इस फैसले को एक बार फिर देश के राजनीतिक हलकों में याद किया जा रहा है।
12 जून 1975 ही वह दिन था जब जस्टिस सिन्हा ने हाईकोर्ट के रूम नंबर 24 में यह अहम फैसला सुनाया था। प्रशासनिक फेरबदल के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट में रूम नंबर 24 को अब न्याय कक्ष या कोर्ट रूम 34 कहा जाता है। उस दौरान क्या-क्या हुआ था, इस मामले में फैसला सुनाने से पहले जस्टिस सिन्हा और उनके परिवार को किस तरह के दबावों का सामना करना पड़ा। क्या थी यह सारी कहानी जानते हैं इस आर्टिकल में…
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इंदिरा के निर्वाचन को अदालत में चुनौती
राज नारायण 1971 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की जीत के खिलाफ हाईकोर्ट पहुंचे थे। राज नारायण ने इंदिरा गांधी के खिलाफ संयुक्त समाजवादी पार्टी के विपक्षी उम्मीदवार के रूप में रायबरेली लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा था। उन्होंने चुनाव में धांधली और सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का आरोप लगाया था और चुनाव परिणामों को अदालत में चुनौती दी थी।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ताओं का कहना है कि सुरक्षा कारणों से दूसरी मंजिल पर स्थित कोर्ट रूम को चुना गया था क्योंकि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को इस मामले में 18 और 19 मार्च को अदालत में पेश होना था। राज नारायण की याचिका पहले न्यायमूर्ति विलियम ब्रूम की बेंच के लिए लिस्ट की गई थी।
कैसे जस्टिस सिन्हा के सामने पहुंची याचिका
आपको बता दें कि ब्रूम हाईकोर्ट के आखिरी ब्रिटिश जज थे। वे दिसंबर 1971 में रिटायर हुए। इसके बाद यह याचिका जस्टिस बीएन लोकुर और केएन श्रीवास्तव के सामने पहुंची, लेकिन इन दोनों के रिटायर होने के बाद राज नारायण की याचिका 1975 में जस्टिस सिन्हा की बेंच के सामने सूचीबद्ध की गई।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय (सोर्स- सोशल मीडिया)
12 फरवरी 1975 को जब इस मामले में गवाहों की रिकॉर्डिंग शुरू हुई तो दोनों पक्षों की तरफ से कई चर्चित हस्तियां कोर्ट रूम में मौजूद थीं। इंदिरा गांधी की तरफ से योजना आयोग के तत्कालीन उपाध्यक्ष पीएन हक्सर और राज नारायण की तरफ से भारतीय जनसंघ के तत्कालीन अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी के साथ बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर और कांग्रेस के अध्यक्ष एस निजलिंगप्पा थे। इंदिरा गांधी की तरफ से एससी खरे ने बहस की जबकि राज नारायण की तरफ से शांति भूषण और आरसी श्रीवास्तव ने पक्ष रखा।
जब इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुंची इंदिरा गांधी
इंदिरा गांधी इस मामले में गवाही देने के लिए 17 मार्च, 1975 को इलाहाबाद पहुंचीं। अदालत में काफी गहमागहमी थी। विपक्षी नेता माधव लिमये, श्याम नंदन मिश्रा (जो बाद में विदेश मंत्री बने) और रवि राय (जो बाद में लोकसभा के अध्यक्ष बने) अदालत कक्ष के एक तरफ थे जबकि इंदिरा गांधी के बेटे राजीव गांधी और उनकी बहू सोनिया गांधी दूसरी तरफ थीं।
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आम तौर पर एक गवाह अदालत में गवाही देने के लिए कठघरे में खड़ा होता है लेकिन इंदिरा गांधी को कुर्सी दी गई थी। इंदिरा गांधी के वकील एससी खरे ने जस्टिस सिन्हा से अनुरोध किया था कि एक आयोग बनाया जाए जो दिल्ली में उनका बयान दर्ज कर सके लेकिन जस्टिस सिन्हा ने उनके अनुरोध को अस्वीकार कर दिया। कुछ दिनों तक बहस चलती रही और 23 मई 1975 को गर्मी की छुट्टियों के कारण अदालत बंद हो गई।
प्रशांत भूषण की किताब में हुआ बड़ा खुलासा
इस मामले में राज नारायण के वकील रहे शांति भूषण के बेटे प्रशांत भूषण ने अपनी किताब The Case That Shook India: The Verdict That Led to the Emergency में लिखा है कि केस के दौरान जस्टिस सिन्हा और उनके परिवार को कई तरह के दबाव झेलने पड़े।
जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा (सोर्स- सोशल मीडिया)
कहा जाता है कि अगले तीन हफ़्तों तक जब जस्टिस सिन्हा अपना फ़ैसला लिख रहे थे, उन्होंने खुद को घर में बंद कर लिया था और उनसे मिलने आए लोगों को बताया गया कि वे अपने बड़े भाई से मिलने उज्जैन गए हैं। प्रशांत भूषण अपनी किताब में लिखते हैं कि फ़ैसले से एक रात पहले जस्टिस सिन्हा ने अपने स्टेनो मन्ना लाल को हाईकोर्ट बिल्डिंग से सटे बंगला नंबर 10 में रहने की व्यवस्था की थी। अब यह बंगला मौजूद नहीं है।
क्या बोले जस्टिस सिन्हा के बेटे विपिन?
जस्टिस सिन्हा के बेटे और इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व जज जस्टिस विपिन सिन्हा याद करते हैं, “मैं तब 11वीं क्लास में था और वो दिन हमारे लिए बहुत मुश्किल भरे थे। हमें बहुत से अभद्र फ़ोन कॉल आते थे और हम अपने पिता को फ़ोन उठाने नहीं देते थे।”
‘इंदिरा नेहरू गांधी’ का निर्वाचन रद्द
जस्टिस सिन्हा के इस फ़ैसले का भारतीय राजनीति पर बहुत गहरा असर हुआ। जस्टिस सिन्हा ने अपने फैसले में कहा, “याचिका स्वीकार की जाती है और प्रतिवादी संख्या 1 श्रीमती इंदिरा नेहरू गांधी का लोकसभा के लिए निर्वाचन शून्य घोषित किया जाता है। उन्हें इस आदेश की तिथि से 6 वर्ष के लिए अयोग्य घोषित किया जाता है।” जस्टिस सिन्हा के फैसले के बाद इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू कर दिया। आपातकाल की यह अवधि 21 महीने तक चली।
फैसले पर लगा दिया 20 दिन का स्टे
फैसले के दिन इलाहाबाद हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज शंभूनाथ श्रीवास्तव भी कोर्ट के कोर्ट रूम नंबर 24 में मौजूद थे। जस्टिस श्रीवास्तव कहते हैं कि इस फैसले के बाद कुछ लोग हैरान रह गए। इंदिरा गांधी के वकील एससी खरे के भतीजे और उनके जूनियर वीएन खरे (जो बाद में सीजेआई बने) ने हाथ से स्टे एप्लीकेशन तैयार की लेकिन जस्टिस सिन्हा ने अपने फैसले पर 20 दिन का स्टे लगा दिया। जस्टिस श्रीवास्तव कहते हैं, “सब कुछ इतनी जल्दी में हुआ कि स्टे एप्लीकेशन भी टाइप नहीं हो पाई।”
न्यायविदों के लिए ‘लकीर’ बन गया फैसला
वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक मेहता, जो वर्तमान में उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त महाधिवक्ता हैं, कहते हैं, “बहुत कम न्यायाधीश हैं जो न्यायमूर्ति सिन्हा और न्यायमूर्ति एचआर खन्ना की बराबरी कर सकें। जब भी चुनाव से जुड़ी कोई याचिका अदालत के सामने आती है, तो हमारे दिमाग में सबसे पहले ‘राज नारायण बनाम इंदिरा गांधी’ का मामला आता है। इसके लिए हमें इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले पर गर्व है।”
एक नहीं भारत में 3 बार लगी इमरजेंसी, तीसरे आपातकाल पर ही क्यों मचता है बवाल?
मार्च 2008 में न्यायमूर्ति सिन्हा का निधन हो गया। अगस्त 1996 में एक साक्षात्कार के दौरान न्यायमूर्ति सिन्हा ने इस फैसले को सामान्य बताया और कहा, “मेरे लिए यह किसी भी अन्य मामले की तरह ही था। फैसला सुनाए जाने के साथ ही मेरा काम खत्म हो गया।”
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