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Explainer: क्या सत्ता से बाहर हो जाती BJP? INDIA गठबंधन की एक गलती ने कैसे बदल दिया राजनीतिक इतिहास?
- Written By: मनोज आर्या
BJP vs INDIA Block: अगर इंडिया गठबंधन के सभी दल वाकई 2024 में 100% सीट शेयरिंग के फॉर्मूले पर एकसाथ चुनाव लड़ते, तो देश की राजनीति का स्वरूप कैसा होता? क्या बीजेपी सत्ता से बाहर हो जाती?

क्या 2024 में सत्ता से बाहर हो जाती बीजेपी? (सोर्स- AI)
BJP vs INDIA Block In 2024 Lok Sabha Elections: साल 2023 में जब देश के दो दर्जन से अधिक विपक्षी दलों ने एक मंच पर आकर ‘INDIA’ गठबंधन की नींव रखी थी, तब इसे बीजेपी के अपराजेय रथ को रोकने वाले एक ‘महागठबंधन’ के रूप में देखा गया। हालांकि, 2024 लोकसभा चुनाव से पहले ही एलायंस में बिखराव शुरू हो गया। विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने में सक्रिय भूमिका निभाने वाले नीतीश कुमार सबसे पहले खुद को अलग करते हुए एनडीए में शामिल हो गए।
इसके अलावा गठबंधन में शामिल पार्टियों ने भी जमीनी स्तर पर एकजुटता नहीं दिखाई। पंजाब में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी अलग लड़े। जबकि, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की टीएमसी ने अकेले चुनाव लड़ा, और जम्मू-कश्मीर से लेकर केरल तक कई सीटों पर ‘फ्रेंडली फाइट’ या त्रिकोणीय मुकाबले देखने को मिले।
INDIA गठबंधन की बैठक के बाद चर्चा तेज
आज सोमवार 8 मई को दिल्ली में हुई इंडिया गठबंधन की बैठक के बाद विपक्ष के भविष्य को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। ऐसे में देश की राजनीति और आम जनता के जेहन में यह बड़ा सवाल है कि अगर ‘INDIA’ गठबंधन के सभी दल वाकई 100% सीट शेयरिंग के फॉर्मूले पर एकसाथ चुनाव लड़ते, तो देश की राजनीति का स्वरूप कैसा होता? क्या बीजेपी सत्ता से बाहर हो जाती? आइए आंकड़े, वोट शेयरिंग और सियासी समीकरणों के आधार पर सबकुछ विस्तार से जानते हैं।
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8 जून, 2026 को नई दिल्ली में आयोजित बैठक में शामिल इंडिया गठबंधन के नेता, (सोर्स- X/@INCIndia)
2024 लोकसभा चुनाव का असली हकीकत
इस ‘क्या और अगर’ के विश्लेषण को समझने के लिए सबसे पहले हमें 2024 के असल चुनावी नतीजों के आंकड़ों को देखना होगा। चुनावी नतीजों पर नजर डालें तो NDA (बीजेपी और सहयोगी दलों) ने कुल 293 सीटों पर जीत हासिल की। इसमें अकेले बीजेपी के पास 240 सीटें थीं। लोकसभा में बहुमत का आंकड़ा 272 था, जिसे एनडीए ने नीतीश कुमार की जदयू और और चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी की मदद से पार किया।
विपक्षी गठबंधन INDIA को कुल 234 सीटों पर जीत मिली। इसमें कांग्रेस ने 99, समाजवादी पार्टी ने 37 और टीएमसी ने 29 सीटें जीतीं। यानी विपक्ष बहुमत के जादुई आंकड़े से महज 38 सीटें दूर रह गया था। अब सवाल उठता है कि यदि विपक्षी वोटों का बिखराव पूरी तरह रुक जाता, तो यह 38 सीटों का अंतर कैसे भर सकता था।
वो राज्य जहां ‘एकजुटता’ से बदल जाता खेल
यदि विपक्ष देश भर में ‘एक सीट, एक उम्मीदवार’ के सिद्धांत पर अड़ा रहता, तो कई राज्यों में चुनावी परिणाम बिल्कुल पलट सकते थे। पंजाब और दिल्ली में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी का त्रिकोणीय बिखराव विपक्ष को काफी नुकसान पहुंचाया। पंजाब में कांग्रेस और आप अलग-अलग चुनाव लड़े, जिसका सीधा फायदा कई सीटों पर बीजेपी या शिरोमणि अकाली दल को हुआ या मार्जिन का बड़ा अंतर रहा।
यदि दोनों दल सामूहिक रूप से वोट शेयर (जो कि दोनों का मिलाकर 50% से अधिक था) को एक पाले में लाते, तो क्लीन स्वीप की स्थिति बनती। दिल्ली में भले ही गठबंधन था, लेकिन अगर यह जमीन पर और अधिक आक्रामक होता, तो त्रिकोणीय मुकाबलों की जगह सीधा आमना-सामना होता।
पश्चिम बंगाल में पूरी तरह बिखरा गठबंधन
बंगाल में ममता बनर्जी की टीएमसी ने अकेले चुनाव लड़ा, जबकि कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी (CPM) का अलग गठबंधन था। कई सीटों पर बीजेपी को इसलिए फायदा हुआ क्योंकि गैर-बीजेपी वोट टीएमसी और वामपंथी-कांग्रेस गठबंधन के बीच बंट गए। यदि बंगाल की सभी 42 सीटों पर विपक्ष का एक ही मजबूत उम्मीदवार होता, तो बीजेपी की जो 12 सीटें वहां आई थीं, उनमें से कम से कम 6 से 8 सीटों का नुकसान एनडीए को उठाना पड़ सकता था।

केरल में यूडीएफ और एलडीएफ आमने-सामने
केरल में यूडीएफ (UDF) और एलडीएफ (LDF) आमने-सामने लड़ते हैं, जबकि दोनों राष्ट्रीय स्तर पर इंडिया ब्लॉक का हिस्सा हैं। हालांकि, बीजेपी को यहां बहुत बड़ी बढ़त तो नहीं मिली, लेकिन पूरे देश में कार्यकर्ताओं के बीच एकजुटता का जो मनोवैज्ञानिक संदेश जाता, वह पूरी हिंदी बेल्ट के नैरेटिव को बदल दिया।
क्या वाकई सत्ता से बाहर हो सकती थी बीजेपी?
राजनीतिक विश्लेषकों और ‘वोट शेयर ट्रांसफर’ के सिद्धांतों के अनुसार, यदि ‘INDIA’ गठबंधन 100% एकजुट होकर चुनाव लड़ता, तो बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए के लिए सरकार बनाना बेहद मुश्किल हो जाता या वह सत्ता से बाहर भी हो सकती थी। इसके पीछे तीन बड़े कारण हैं। आइए इस पर नजर डालते हैं।
वोटों का गैर-विभाजन: भारत की ‘फर्स्ट पास्ट द पोस्ट’ (जिसको सबसे ज्यादा वोट मिले, वो जीता) चुनावी सिस्टम में कई बार 1% या 2% वोटों के अंतर से सीटें बदल जाती हैं। देश की लगभग 40-50 सीटें ऐसी थीं, जहां विपक्ष के अलग-अलग उम्मीदवारों को मिले वोटों का जोड़ बीजेपी के जीतने वाले उम्मीदवार से अधिक था। अगर ये वोट एक जगह गिरते, तो एनडीए 293 से घटकर 250 के नीचे आ जाता।
नीतीश और नायडू का रुख: यदि एनडीए चुनाव के बाद 250 से नीचे सिमट जाता, तो किंगमेकर की भूमिका में बैठे चंद्रबाबू नायडू (16 सीटें) और नीतीश कुमार (12 सीटें) पर इंडिया ब्लॉक में शामिल होने का भारी राजनीतिक दबाव होता। ऐसे में केंद्र में विपक्ष की सरकार बनने की संभावनाएं 90% तक बढ़ जातीं।
INDIA गठबंधन में 100% एकजुटता क्यों असंभव?
राजनीति केवल अंकगणित नहीं है, केवल कागजों पर वोट जोड़ देने से जमीन पर वोट ट्रांसफर नहीं होते। अगर इंडिया ब्लॉक पूरी तरह एक हो जाता, तो इसके कुछ विपरीत परिणाम भी हो सकते थे। पंजाब में कांग्रेस का पारंपरिक वोटर आम आदमी पार्टी को वोट देने में हिचकिचाता, और ठीक ऐसा ही बंगाल में टीएमसी और वामपंथियों के बीच होता। जब कट्टर प्रतिद्वंदी पार्टियां हाथ मिलाती हैं, तो जमीन पर एक बड़ा तबका नाराज होकर न्यूट्रल हो जाता है और वह तीसरे विकल्प की तरफ शिफ्ट हो जाता है।
यह भी पढ़ें: दिल्ली में INDIA गठबंधन की बैठक खत्म, मोदी सरकार के खिलाफ विपक्षी दलों ने भरी हुंकार; खरगे ने बताया फुल प्लान
यदि सभी 28-30 दल एक हो जाते, तो बीजेपी को ‘सभी भ्रष्ट और परिवारवादी दल एक अकेले मोदी को हटाने के लिए एक हो गए हैं’ का नैरेटिव बनाने में और आसानी होती। इससे देश के न्यूट्रल या फ्लोटिंग वोटर्स का ध्रुवीकरण बीजेपी के पक्ष में और मजबूत हो सकता था।
Bjp vs india block how one mistake of opposition change political history explainer
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