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जयंती विशेष : वो शासक जो बना दिल्ली का सातवां मुगल बादशाह, जानिए कैसे हासिल की थी गद्दी
- Written By: विकास कुमार उपाध्याय
बहादुर शाह प्रथम का शासनकाल मुगल इतिहास में एक संक्रांति का समय माना जाता है। उन्होंने उदारता और सामंजस्य की नीति अपनाई, लेकिन पारिवारिक संघर्ष और प्रशासनिक कमजोरियों ने उनके शासन को कमजोर कर दिया।

Bahadur Shah I
नवभारत डेस्क : बहादुर शाह प्रथम को शाहआलम प्रथम या आलमशाह प्रथम के नाम से भी जाना जाता है। बहादुर शाह प्रथम दिल्ली के सातवें मुग़ल बादशाह थे। उनका जन्म 14 अक्टूबर 1643 को बुरहानपुर, भारत में हुआ था। उनका असली नाम शहज़ादा मुअज्ज़म था, और वह मुगल बादशाह औरंगजेब के दूसरे पुत्र थे। अपने पिता के सबसे योग्य उत्तराधिकारी माने जाने वाले मुअज्ज़म ने अपने शासनकाल में कई चुनौतियों का सामना किया, लेकिन उन्हें इतिहास में उदार और संतुलित शासक के रूप में याद किया जाता है। वह दिल्ली की गद्दी पर सातवें मुगल बादशाह के तौर पर काबिज हुआ था।
बहादुर शाह प्रथम का प्रारंभिक जीवन राजनीतिक उथल-पुथल और पारिवारिक प्रतिस्पर्धा से भरा रहा। उन्होंने अपनी युवावस्था में ही दक्षिण भारत में अपने पिता औरंगज़ेब का प्रतिनिधित्व किया और मराठों के खिलाफ सेना का नेतृत्व किया। हालांकि, मराठों और पुर्तग़ालियों के साथ युद्ध में उनकी असफलता से उन्हें दक्षिण भारत से लौटना पड़ा। इसके बाद, उन्हें 1699 में काबुल का सूबेदार नियुक्त किया गया, जहां उन्होंने प्रशासनिक जिम्मेदारियों का निर्वहन किया।
उत्तराधिकार युद्ध और सत्ता का अधिग्रहण
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औरंगजेब की मृत्यु के बाद, शहज़ादा मुअज्ज़म ने मई 1707 में लाहौर के पास ‘शाहदौला’ के पुल पर खुद को बहादुर शाह के नाम से सम्राट घोषित किया। इसके बाद, उन्हें अपने भाइयों आज़मशाह और कामबख़्श से सिंहासन के लिए युद्ध करना पड़ा। 12 जून 1707 को सामूगढ़ के निकट जाजऊ में आज़मशाह के साथ हुई लड़ाई में बहादुर शाह ने विजय प्राप्त की। बाद में, उन्होंने हैदराबाद में कामबख़्श को हराकर उसे भी पराजित किया।
राजपूतों और सिक्खों से संघर्ष
बहादुर शाह प्रथम के शासनकाल में राजपूतों और सिक्खों से विवाद जारी रहे। राजपूताना में अजीत सिंह के साथ सन्धि कर उन्होंने राजपूतों से संघर्ष से बचने की कोशिश की, लेकिन यह प्रयास अस्थायी साबित हुआ। वहीं, सिक्ख गुरु गोविन्द सिंह की हत्या के बाद सिक्खों ने विद्रोह कर दिया, जिसका नेतृत्व बन्दा सिंह बहादुर ने किया। बहादुर शाह ने सिक्ख विद्रोह को दबाने के लिए कई प्रयास किए, जिनमें सरहिंद और लोहगढ़ के किलों पर कब्जा भी शामिल था। मराठों के प्रति उनकी नीति अस्थिर रही। उन्होंने शाहू को स्वतंत्रता दी, लेकिन ‘चौथ’ और ‘सरदेशमुखी’ के मुद्दे पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया। इसके अलावा, उन्होंने ज़ुल्फ़िक़ार खां को मीर बख़्शी और दक्कन की सूबेदारी जैसे दो महत्वपूर्ण पद देकर प्रशासनिक त्रुटि की।
बहादुर शाह प्रथम की मृत्यु 27 फरवरी 1712 को हो गई। उनकी मृत्यु के बाद उनके चारों पुत्रों के बीच उत्तराधिकार का युद्ध छिड़ गया। जहांदार शाह, अजीमुश्शान, रफ़ीउश्शान, और जहानशाह ने एक-दूसरे के खिलाफ जंग छेड़ दी, जिससे मुग़ल साम्राज्य में और अधिक बिलगाव हुआ।
बहादुर शाह प्रथम के बारे में रोचक तथ्य जिसकी जानकारी आपको रखनी चाहिए
- शाहे बेखबर : बहादुर शाह प्रथम को इतिहास में “शाहे बेखबर” के नाम से भी जाना जाता है। यह उपनाम उन्हें उनकी लापरवाह और निष्क्रिय प्रवृत्ति के कारण मिला था, क्योंकि वे प्रशासनिक मामलों में अधिक ध्यान नहीं देते थे।
- सैय्यद की उपाधि : बहादुर शाह प्रथम मुगल इतिहास में अकेले ऐसे शासक थे जिन्होंने सैय्यद की उपाधि का प्रयोग किया था। यह उपाधि आमतौर पर धार्मिक विद्वानों और इमामों को दी जाती थी, लेकिन बहादुर शाह ने इसे राजनीतिक प्रतिष्ठा के रूप में अपनाया।
- दक्कन का गवर्नर : बहादुर शाह को महज 20 वर्ष की आयु में दक्कन का गवर्नर बनाया गया था। यह उनके शुरुआती प्रशासनिक करियर की महत्वपूर्ण शुरुआत थी, जिसमें उन्हें बड़ी जिम्मेदारी दी गई थी।
- शिवाजी से हार : बहादुर शाह को छत्रपति शिवाजी महाराज के साथ हुए युद्ध में हार का सामना करना पड़ा था। शिवाजी ने इस हार के बाद उन्हें 8 साल तक कैद में रखा, जो बहादुर शाह के जीवन का कठिन दौर था।
- औरंगजेब के खिलाफ साजिश : बहादुर शाह ने अपने पिता औरंगजेब को गद्दी से हटाने के लिए कई बार साजिशें रचीं। हालांकि, वे हर बार असफल हुए और अपने पिता की दया पर निर्भर रहे।
- धार्मिक सहिष्णुता : बहादुर शाह ने धर्म के प्रति गहरा सम्मान दिखाते हुए 1695 में गुरु गोबिंद सिंह की सेना के खिलाफ युद्ध लड़ने से इंकार कर दिया था। उनका यह कदम उनकी धार्मिक सहिष्णुता और न्यायप्रियता को दर्शाता है।
- अंतिम सफल मुगल सम्राट : सन् 1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद बहादुर शाह अंतिम सफल मुगल सम्राट बने। उनके बाद मुग़ल साम्राज्य का पतन तेजी से शुरू हुआ, लेकिन उनके शासनकाल को अंतिम स्थिर दौर माना जाता है।
- राजपूतों के साथ शांति संधि : बहादुर शाह ने जोधपुर के राजा अजीत सिंह और अंबर के राजा मान सिंह के साथ शांति संधियों पर हस्ताक्षर किए थे। इन समझौतों ने राजपूतों के साथ संबंधों में सुधार किया और मुगल साम्राज्य की स्थिरता को सुनिश्चित किया।
- सिखों और राजपूतों से विवाद : बहादुर शाह के शासनकाल में सिखों और राजपूतों के साथ विवादों की एक श्रृंखला जारी रही। विशेष रूप से बन्दा बहादुर के नेतृत्व में सिखों का विद्रोह एक गंभीर चुनौती थी, जिसका सामना उन्होंने अपने अंतिम वर्षों में किया।
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