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लालू-राबड़ी काल में हुआ बवाल…तेजस्वी के लिए बन गया महाकाल, जानिए क्या है ‘जंगल राज’ की जन्मकुंडली
- Written By: अभिषेक सिंह
Bihar Assembly Elections: तेजस्वी यादव का 'जंगल राज' से कितना नाता है? यह शब्द कहां से आया? लालू के शासनकाल में अपराध के लिए इस प्रयोग हुआ था या फिर कहानी कुछ और है?

लालू प्रसाद यादव व राबड़ी देवी (सोर्स- सोशल मीडिया)
Bihar Politics: बिहार चुनाव में एक बार फिर ‘जंगल राज’ का जिन निकल चुका है। एनडीए के सभी दल और राजनेता तेजस्वी यादव पर इसी को लेकर हमला बोल रहे हैं। 20 साल पहले के शासनकाल का जिक्र हो रहा है और महागठबंधन के खिलाफ माहौल बनाया जा रहा है। यह पहली बार नहीं है हर बार इसका जिक्र चुनाव के दौरान भर-भरकर होता है।
इस बीच सवाल यह है कि तेजस्वी यादव का ‘जंगल राज’ से कितना नाता है? यह शब्द कहां से आया? लालू के शासनकाल में अपराध के लिए इस प्रयोग हुआ था या फिर कहानी कुछ और है? जिनके जवाब हम आपको इस रिपोर्ट में देने जा रहे हैं। तो चलिए शुरू करते हैं…
आखिर क्या है जंगलराज की जन्मकुंडली?
लालू प्रसाद यादव की आरजेडी को जब साल 2005 में हुए विधान सभा चुनाव में हार मिली, तब तेजस्वी यादव की उम्र महज 16 वर्ष थी। इसके बाद भी जब तेजस्वी यादव चुनावी मैदान में उतरते हैं तो आरजेडी के कथित ‘जंगल राज’ की परछाई उनके साथ चलने लगती है।
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लोककथाओं की तरह फैल रही कहानियां
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में मतदान करने जा रहे तमाम युवाओं ने उस वक्त दुनिया में कदम भी नहीं रखा था। इसके बावजूद एनडीए नेता ‘भयावह जंगल राज’ की कहानियां नई पीढ़ी तक लोककथाओं के माफिक पहुंचा रहे हैं। इन्ही कुशासन अराजकता और बदहाली की कहानियों से बिहार को जोड़ा भी जाता है।
कहां से हुआ ‘जंगल राज’ का जन्म?
“जंगल राज” शब्द का इस्तेमाल पहली बार 1997 में हुआ था, और इसका मतलब आज के राजनीतिक मतलब से बिल्कुल अलग था। उस समय, चारा घोटाले में फंसे लालू प्रसाद यादव ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था, और राबड़ी देवी ने शपथ ली थी। पटना हाई कोर्ट ने जलभराव और खराब ड्रेनेज से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा था, “पटना में हालात जंगल राज से भी बदतर हैं।” विपक्ष ने इस बात को राजनीतिक हथियार बना लिया, और यह शब्द जल्द ही हमेशा के लिए RJD के 15 साल के राज से जुड़ गया।
ये हैं लालू-राबड़ी शासनकाल के तीन चरण
RJD के राज को मोटे तौर पर तीन फेज में बांटा जा सकता है-राजनीति का मंडलीकरण, राजनीतिक का धर्मनिरपेक्षीकरण और राजनीति का यादवीकरण। पहले दो फेज में, गोपालगंज के फुलवरिया गांव के एक आम परिवार के सदस्य लालू प्रसाद यादव सत्ता में आए और कांग्रेस के तहत ऊंची जातियों के दबदबे को तोड़ते हुए OBC-सेंट्रिक पॉलिटिक्स की नींव रखी। 1990 में लालू के सत्ता में आने के बाद से, लगभग 35 सालों में, बिहार की पॉलिटिक्स में ऊंची जातियों की मोनोपॉली खत्म हो गई है।
लालू यादव व राबड़ी देवी (सोर्स- सोशल मीडिया)
लालू ने OBC/EBC/SC वोटरों को एक करने के लिए मंडल मूवमेंट का इस्तेमाल किया। 1989 के भागलपुर दंगों के बाद, वह कांग्रेस की कीमत पर मुस्लिम कम्युनिटी के फेवरेट बन गए। 1990 में समस्तीपुर में BJP लीडर लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा को रोककर, वह सेक्युलर वोटरों के हीरो बन गए।
तीसरे फेज यानी राजनीति के यादवीकरण में लालू प्रसाद यादव ने यादव कम्युनिटी को मजबूत बनाने पर बहुत फोकस किया। इस वजह से, गैर-यादव OBC, EBC और दलित समुदाय धीरे-धीरे अलग-थलग पड़ गए। इस बंटवारे ने 2005 में नीतीश कुमार की लीडरशिप वाली NDA के सत्ता में आने का रास्ता बनाया।
लालू-राबड़ी राज से जुड़ी सबसे आम बात “पॉलिटिक्स का क्रिमिनलाइज़ेशन” थी। आंकड़े बताते हैं कि 2001 से 2004 (राबड़ी देवी के समय) के बीच फिरौती के लिए किडनैपिंग के 1,527 मामले दर्ज किए गए, जबकि 2006 से 2009 के बीच यह संख्या घटकर 429 हो गई।
किसलय की किडनैपिंग ने बटोरी सुर्खियां
2005 में, पटना के स्कूल के लड़के किसलय की किडनैपिंग ने पूरे देश में सुर्खियां बटोरीं। उस समय, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने छपरा में एक रैली में कहा था, “मुझे मेरा किसलय वापस दे दो।” किसलय सही-सलामत घर लौट आया, लेकिन यह बिहार के उन बहुत कम किडनैपिंग मामलों में से एक था जिसका अंत अच्छा हुआ।
जाति के आधार पर हुए कई नरसंहार
इसके बाद जाति के आधार पर नरसंहार हुए। 1976 के अखोरी (भोजपुर) हत्याकांड से लेकर 2001 के जहानाबाद हत्याकांड तक, कुल 737 लोग मारे गए, जिनमें कई पुलिसवाले भी शामिल थे। इनमें से सबसे ज़्यादा हत्याएं, 337, 1994 और 2000 के बीच हुईं। 1991 और 2001 के बीच, 58 नरसंहारों में 566 लोग मारे गए, जिनमें 343 अनुसूचित जाति/OBC खेतिहर मज़दूर और 128 ऊंची जाति के ज़मीन के मालिक शामिल थे।
1997 में 12 नरसंहार हुए, जिनमें 130 लोग मारे गए। उससे पिछले साल यानी 1996 में 11 नरसंहार हुए, जिनमें 76 लोग मारे गए। 1999 में सात नरसंहारों में 108 लोगों की जान गई तो इसके बाद 2000 में पांच नरसंहार हुए, जिनमें 69 लोग मारे गए। 2001 में दो नरसंहार हुए, जिनमें 11 लोग मारे गए।
लालू-राबड़ी राज में हुए बड़े नरसंहार
- 1992, बारा (गया): 34 अगड़ी जाति के जमींदार मारे गए
- 1996, बथानीटोला (भोजपुर): 22 दलित-मुस्लिम खेतिहर मजदूरों की हत्या
- 1997, लक्ष्मणपुर बाथे (अरवल): 58 दलित मजदूर मारे गए
- 1998, शंकरबिगहा (जहानाबाद): 23 दलितों की हत्या
- 1999, सेनारी (जहानाबाद): 35 अगड़ी जाति के लोगों की हत्या
“ब्रोकन प्रॉमिस: कास्ट, क्राइम, एंड पॉलिटिक्स इन बिहार” के लेखक मृत्युंजय शर्मा लिखते हैं, “सोशल जस्टिस की आड़ में सरकारी संस्थाओं को सिस्टमैटिक तरीके से कमज़ोर किया गया। 1992 में 384 IAS अधिकारियों में से 144 ने सेंट्रल डेप्युटेशन की मांग की। यह उस दौर की हताशा को दिखाता है। पुलिस पॉलिटिकल दबदबे का एक टूल बन गई थी, जो अक्सर क्राइम में शामिल होती थी।”
लालू प्रसाद यादव व राबड़ी देवी (सोर्स- सोशल मीडिया)
शर्मा आगे बताते हैं कि 1990 के दशक के आखिर तक लाखों लोगों के आने-जाने का एकमात्र ज़रिया माइग्रेशन बन गया था। वह आगे कहते हैं, “एक पूरी पीढ़ी यह मानकर बड़ी हुई कि तरक्की बिहार की सीमाओं के बाहर है। एक राज्य जो पहले से ही अपनी लेबर सप्लाई के लिए जाना जाता था, उसमें 1991 और 2001 के बीच माइग्रेशन में 200% की बढ़ोतरी देखी गई।”
आरजेडी ने बताया क्यों होता है इस्तेमाल
हालांकि, RJD का दावा है कि “जंगल राज” शब्द का इस्तेमाल लालू-राबड़ी राज की सोशल जस्टिस की कामयाबियों से ध्यान हटाने के लिए किया जाता है। हाल के सालों में इसने नीतीश कुमार के समय के क्राइम के आंकड़ों को लेकर NDA को टारगेट करने की कोशिश की है।
RJD के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुबोध कुमार ने कहा कि ‘जंगल राज’ का मुद्दा उठाना और पिछले 20 सालों में हुई 60,000 हत्याओं पर चुप रहना अब NDA की पॉलिटिक्स का हिस्सा बन गया है। जुलाई में जारी CAG रिपोर्ट में कहा गया है कि नीतीश कुमार सरकार ने 70 हजार 877.61 करोड़ की रकम का यूटिलाइज़ेशन सर्टिफिकेट जमा नहीं किया है। सरकार को अभी तक इसका हिसाब देना है।
यह भी पढ़ें: सियासत-ए-बिहार: बिहार का वो CM जिसने खुद को समझ लिया शक्तिमान, राजीव गांधी खफा हुए तो चली गई कुर्सी
सुबोध कुमार ने आगे कहा कि लालू प्रसाद यादव हमेशा “गरीबों और दबे-कुचले लोगों” के लिए लड़े हैं। उन्होंने कहा, “केंद्रीय रेल मंत्री के तौर पर, उन्होंने रेलवे को बदल दिया। डिप्टी चीफ मिनिस्टर के तौर पर तेजस्वी प्रसाद यादव ने 500,000 नौकरियां पैदा करने में अहम भूमिका निभाई।” जब NDA के पास कहने के लिए कुछ नहीं होता, तो वह जंगल राज का सहारा लेती है।”
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