
कौन था नक्सली 'घोस्ट' हिडमा? फोटो- सोशल मीडिया
Naxal Commander Hidma History: छत्तीसगढ़ के बस्तर के घने जंगल। जहां एक खूंखार शिकारी AK-47 के साथ घूमता था। 1 करोड़ के इस इनामी नक्सली ने 35 साल तक संगठन में रहते हुए सैकड़ों बेगुनाहों के खून से अपना इतिहास रचा था। यह कहानी है हिडमा की, जिसका पूरा नाम माडवी हिडमा है, और जिसे संतोष, इंदमुल, और पोडियाम भीमा जैसे कई और नामों से भी जाना जाता था। हिडमा का जन्म सुकमा जिले के घने पुवर्ती गांव में हुआ माना जाता है। हिडमा एक आदिवासी था, जो ऐसे माहौल में पला-बढ़ा जहां उसने सिर्फ माओवादियों के शासन को देखा।
वर्ष 1990 में मामूली लड़ाके के रूप में माओवादी संगठन से जुड़ने वाला यह दुबला-पतला और नाटा कद का युवक महज 16 साल की उम्र में संगठन द्वारा चुन लिया गया था। हिडमा सिर्फ 10वीं तक पढ़ा था, लेकिन अध्ययन की गहरी आदत ने उसे फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने में अभ्यस्त बना दिया था। शुरुआती ट्रेनिंग के बाद उसकी पहली पोस्टिंग महाराष्ट्र के गढ़चिरौली इलाके में हुई थी। हिडमा हमेशा एक नोटबुक साथ रखता था और अपने नोट्स तैयार करता था। उसकी पहचान का सबसे बड़ा निशान उसके बाएं हाथ की एक अंगुली का ना होना था।
संगठन में हिडमा का कद बस्तर के स्थानीय माओवादियों की तुलना में बहुत बड़ा था। उसकी फुर्ती और सटीक रणनीति बनाने की क्षमता के कारण वह बहुत ही जल्दी एरिया कमांडर बन गया था। हिडमा को हथियार चलाने की ट्रेनिंग कुख्यात महिला नक्सली सुजाता ने दी थी, जिसे ‘लेडी वीरप्पन’ भी कहा जाता था और जो 2024 में गिरफ्तार हुई थी।
अपने रणनीतिक कौशल के दम पर, हिडमा ने संगठन में तेजी से तरक्की की। 2017 में वह सबसे कम उम्र में माओवादियों की शीर्ष सेंट्रल कमेटी (CC) का सदस्य बन गया। वह पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (PGLA) की बटालियन-1 का चीफ था, जिसे संगठन की सबसे सक्रिय और खतरनाक यूनिट माना जाता है। 2019 में रमन्ना की मौत के बाद वह नक्सलियों का शीर्ष कमांडर बना दिया गया था।

हिडमा भारत के सबसे वांछित कमांडरों में से एक था, जिस पर 1 करोड़ रुपये का इनाम घोषित था। वह AK-47 राइफल लेकर चलता था और चार चक्रों की सुरक्षा से घिरा रहता था। उसके खूनी इतिहास में 27 से ज्यादा बड़े हमले शामिल हैं। छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में माओवादियों का सबसे खूंखार कमांडर माना जाता था। वह 2013 के कुख्यात झीरम घाटी नरसंहार (दरभा घाटी) का मास्टरमाइंड था, जिसमें 27 लोग मारे गए थे, जिनमें शीर्ष कांग्रेस नेता जैसे विद्याचरण शुक्ला और महेंद्र कर्मा शामिल थे। इस हमले ने राजनीतिक हलकों में हड़कंप मचा दिया था। इसके अलावा, हिडमा 2010 के दंतेवाड़ा हमले के पीछे भी था, जिसमें 76 सीआरपीएफ जवान शहीद हो गए थे।
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यह माओवादियों का अब तक का सबसे घातक हमला था। 2017 में सुकमा में हुए घात हमले की साजिश भी उसी ने रची थी, जिसमें दर्जनों जवान हताहत हुए। 2021 के सुकमा-बीजापुर एनकाउंटर में भी उसकी भूमिका थी, जहां 22 जवान शहीद हुए। कुल मिलाकर, हिडमा 26 से अधिक हमलों में शामिल रहा, जिससे वह 1 करोड़ रुपये का इनामी बन गया।

हिडमा का खूनी सफर 18 नवंबर 2025 को तब खत्म हुआ, जब वह छत्तीसगढ़-आंध्र प्रदेश बॉर्डर पर सुरक्षा बलों के साथ हुई भीषण मुठभेड़ में मारा गया। हिडमा की पत्नी राजे, जो नक्सल संगठन से जुड़ी हुई थी, वह भी इस ऑपरेशन में ढेर हो गई है। कुछ समय पहले, हिडमा की मां ने उससे हिंसा का रास्ता छोड़कर आत्मसमर्पण करने की भावुक अपील की थी, लेकिन हिडमा नहीं लौटा। साल 2024 में नक्सली कमांडर हिडमा की मां से जिले के एसपी किरण चव्हाण ने मुलाकात भी की थी।






