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इतना आसान नहीं है अपराधी किस्म के राजनेताओं को चुनाव लड़ने से रोकना और सजा दिलाना
देश की जानी मानी संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) के द्वारा एक राष्ट्रीय स्तर का वेबिनार आयोजित किया, जिसमें देश की कई जानी मानी हस्तियों ने चुनावी व्यवस्था और उससे जुड़ी समस्याओं पर चर्चा की।
- Written By: आकाश मसने

कानून तोड़ने वालों को कानून निर्माता बनाने पर एडीआर वेबिनार (डिजाइन फोटो)
नवभारत डेस्क : देश की जानी मानी संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) के द्वारा एक राष्ट्रीय स्तर का वेबिनार आयोजित किया, जिसमें देश की कई जानी मानी हस्तियों ने शिरकत की और देश की चुनावी व्यवस्था और उससे जुड़ी समस्याओं पर एक अच्छी चर्चा की। देश में लोकतंत्र को मजबूत करने और चुनाव लड़ने वाले लोगों के द्वारा जीत के लिए किए जाने वाले गैर-कानूनी कार्यों पर चर्चा हुयी। साथ ही अपराधी किस्म के लोगों और पैसे के दम पर चुनाव जीतने वाले लोगों के बारे में चिंता जतायी गयी।
आपने देखा होगा कि एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स के द्वारा चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों, सांसदों, विधायकों, एमएलसी और मंत्रियों के आपराधिक, वित्तीय, शिक्षा, लिंग और अन्य पृष्ठभूमि के विवरण का विश्लेषण अक्सर किया जाता है और देश के सामने राजनेताओं से संबंधित तमाम विश्लेषण पेश किया जाता है। साथ ही साथ दोबारा चुनाव लड़ रहे सांसदों और विधायकों की संपत्ति सहित तमाम चीजों का तुलनात्मक विश्लेषण भी पेश किया जाता है।
एडीआर के द्वारा 26 मार्च 2025 दिन बुधवार को ‘कानून तोड़ने वाले ही कानून निर्माता बन रहे हैं: भारतीय लोकतंत्र में विरोधाभास’ विषय पर एक वेबिनार आयोजित करके राजनेताओं, सामाजिक कार्यकर्ता, अधिवक्ताओं और पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी जैसे दिग्गज विचारकों को अपनी बात रखने का मौका दिया।
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वेबिनार के मुख्य बिंदु
1. आपराधिक मामलों वाले विधायकों की बढ़ती संख्या पर अंकुश लगाना: बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधेगा? कार्यपालिका या न्यायपालिका?
2. क्या दागी राजनेताओं के बार-बार चुनाव जीतने से सुशासन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है?
3. क्या भारतीय मतदाता राजनेताओं की दागी पृष्ठभूमि से अप्रभावित हैं?
4. दोषी राजनेताओं के लिए आजीवन प्रतिबंध या 10 या 15 साल के लिए अयोग्यता: कौन सा उचित है?
5. फास्ट ट्रैक कोर्ट, एक साल के भीतर मुकदमे को पूरा करना, उम्मीदवारों और राजनीतिक दलों द्वारा मीडिया में आपराधिक मामलों का विवरण प्रकाशित करना आदि जैसे सुप्रीम कोर्ट के कई फैसले, साथ ही विभिन्न समितियों, आयोगों की सिफारिशें भी सुधार लाने में असमर्थ रही हैं। क्या आगे कोई रास्ता है या मतदाता या नागरिक मौजूदा दोहरी व्यवस्था के बंदी बने रहेंगे, जिसमें राजनेताओं और आम नागरिकों के लिए खेल के नियम अलग-अलग हैं?
राजनीति में अपराधी किस्म के लोगों का बोलबाला बढ़ता जा रहा: गौरव गोगोई
वक्ताओं में सबसे पहले कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने राजनीतिक स्थिति को पेश करने की कोशिश की और इस तरह की चर्चा के जरिए आम जनमानस को संदेश देने की पहल को सराहा। सांसद गौरव गोगोई ने कहा कि राजनीति में पैसे व अपराधी किस्म के लोगों का बोलबाला बढ़ता जा रहा है। तमाम तरह के हथकंडे इस्तेमाल करके वे चुनाव जीत जाते हैं। इसलिए अच्छे लोग कम संख्या में चुनावी राजनीति में कूदना पसंद करते हैं, क्योंकि उनको लगता है कि वे धनबल व बाहुबल का मुकाबला नहीं कर पाएंगे।
जीतने वाले उम्मीदवार पर दांव लगाना चाहते है दल: श्रीवास्तव
पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज की अध्यक्ष कविता श्रीवास्तव ने अपने तमाम उदाहरण देकर कहा कि राजनीति में सारे दल जीतने वाले उम्मीदवार पर दांव लगाना चाहते हैं। इसलिए हमारे देश में लोकतंत्र को अपराध व करप्शन भारी नुकसान पहुंचा रहा है। चर्चा के दौरान उन्होंने कई मामलों का उदाहरण भी दिया और कहा कि सारे दलों में कम या अधिक ऐसे लोग हैं, जो देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करते हैं। कविता श्रीवास्तव ने तो चुनाव आयोग पर भी सवाल दागा, जिसके कुछ काम लोगों में तमाम तरह की शंकाएं पैदा कर देते हैं।
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त बोले- पैसे खर्च करने वालों को टिकट दिया जाता है
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त डॉ. एस.वाई. कुरैशी ने कहा कि सारे दलों को लगता है कि किसी तरह से अधिक से अधिक सीटें जीतनी हैं और इसके लिए वे ऐसे उम्मीदवारों पर दांव लगाना चाहते हैं, जो जीत जाए। ऐसे में अपराधियों और अथाह पैसे खर्च करने वाले लोगों को खोज-खोज कर टिकट दे दिया जाता है, क्योंकि ऐसे लोगों के जीतने की संभावना अधिक होती है।
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा कि ऐसे लोगों के मुकदमे भी खूब लटकाए जाते हैं और उनके जुर्म भी साबित कम ही होते हैं। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 2020-21 के दौरान देश में 11-12 राज्यों में बने एमपी-एमएलए के मामलों की सुनवाई वाली स्पेशल कोर्ट के काम काज की समीक्षा की थी, जिसमें भी सुप्रीम कोर्ट को संतोसजनक परिणाम नहीं दिखे थे। ऐसी हालत में सोचने और सख्त कदम उठाने की जरूरत है।
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इसके साथ ही सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने भी अपनी बात रखी और कहा कि राजनीति से इन सब चीजों को खत्म करना उतना आसान नहीं है। चार्जशीट लगने वाले सारे नेताओं को भी चुनाव लड़ने से रोका जाना संभव नहीं है, क्योंकि कोर्ट में पुलिस की चार्जशीट के सारे गुनाह टिक नहीं पाते। कभी-कभी पुलिस के चार्ज केवल हवा-हवाई और शासन सत्ता के दबाव में लगाये गए होते हैं, जो कोर्ट में जाकर खारिज हो जाते हैं।
इसके अलावा अधिवक्ता और आम आदमी पार्टी-मुंबई के कार्यकारी अध्यक्ष रूबेन मस्कारेनहास ने भी अपनी बातें और अनुभव शेयर किए।
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