दांत दर्द और दिमाग की प्रतीकात्मक तस्वीर (सौ. एआई)
Oral Health And Brain Connection: हम अक्सर अपने शरीर के बाकी हिस्सों की सेहत पर तो ध्यान देते हैं लेकिन दांतों और मसूड़ों की सफाई को केवल मुस्कान और सुंदरता तक सीमित मान लेते हैं। हालांकि हालिया वैज्ञानिक शोधों और अध्ययनों ने एक बेहद चौंकाने वाला खुलासा किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि ओरल हेल्थ का सीधा संबंध हमारे मस्तिष्क की कार्यप्रणाली और मानसिक स्थिति से है। अगर आप अपने मुंह की सफाई को नजरअंदाज कर रहे हैं तो आप अनजाने में अपने दिमाग को खतरे में डाल रहे हैं।
मुंह की ठीक से सफाई न करने पर वहां हानिकारक बैक्टीरिया पनपने लगते हैं। शोध बताते हैं कि मसूड़ों में संक्रमण पैदा करने वाले ये बैक्टीरिया खून के प्रवाह के जरिए शरीर के अन्य हिस्सों तक पहुंच सकते हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि ये बैक्टीरिया रक्त-मस्तिष्क अवरोध को पार कर सीधे दिमाग तक पहुंच सकते हैं। कुछ रिसर्च में खराब ओरल हेल्थ का सीधा संबंध मेमोरी लॉस (याददाश्त की कमी) और गंभीर कॉग्निटिव समस्याओं से पाया गया है।
दांतों में कीड़ा लगना, मसूड़ों में सूजन या इन्फेक्शन होने पर होने वाला लगातार दर्द केवल मुंह तक सीमित नहीं रहता। यह असहनीय दर्द आपकी नींद को बुरी तरह प्रभावित करता है। नींद पूरी न होने और लगातार शारीरिक कष्ट के कारण व्यक्ति में चिड़चिड़ापन, तनाव और एंग्जायटी बढ़ने लगती है। लंबे समय तक बना रहने वाला यह तनाव अंततः मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान पहुँचा सकता है।
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ओरल हेल्थ का एक मनोवैज्ञानिक पहलू भी है। पीले दांत, टूटे हुए दांत या सांसों की दुर्गंध व्यक्ति के आत्मविश्वास को गहराई से प्रभावित करती है। ऐसे लोग सार्वजनिक रूप से बोलने, हंसने या मेलजोल बढ़ाने से कतराने लगते हैं। यह सामाजिक अलगाव धीरे-धीरे अकेलेपन की ओर ले जाता है जो डिप्रेशन का एक बड़ा कारक बन सकता है।
अच्छी बात यह है कि इन गंभीर समस्याओं से बचना बहुत आसान है। आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा दोनों ही कुछ बुनियादी आदतों पर जोर देते हैं।
दिन में दो बार विशेष रूप से रात को सोने से पहले फ्लोराइड युक्त टूथपेस्ट से ब्रश जरूर करें।
बैक्टीरिया का एक बड़ा हिस्सा जीभ पर जमा होता है इसलिए टंग क्लीनर का उपयोग करें।
मीठी और चिपचिपी चीजों का सेवन कम करें क्योंकि ये बैक्टीरिया के लिए प्रजनन स्थल का काम करती हैं।
हर 6 महीने में कम से कम एक बार डेंटिस्ट से परामर्श जरूर लें।
बच्चों में बचपन से ही इन आदतों को विकसित करना अनिवार्य है ताकि भविष्य में वे न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक रूप से भी स्वस्थ रह सकें।