तालिबान के नए कानून पर जावेद अख्तर का तीखा बयान, घरेलू हिंसा को ‘कानूनी मान्यता’ देने पर जताई आपत्ति

Javed Akhtar Statement: तालिबान के नए आपराधिक कानून में घरेलू हिंसा को शर्तों के साथ जायज बताए जाने पर जावेद अख्तर ने कड़ी प्रतिक्रिया दी और धार्मिक नेताओं से इसकी निंदा की मांग की।
Javed Akhtar On Taliban
जावेद अख्तर (फोटो-सोर्स,सोशल मीडिया)
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Javed Akhtar On Taliban: पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया (पीएफआई) ने हालिया रिपोर्ट्स पर गहरी चिंता जताई है, जिनमें दावा किया गया कि तालिबान ने घरेलू हिंसा को कुछ शर्तों के तहत वैध ठहरा दिया है। संस्था ने इसे “चौंकाने वाला और खतरनाक” बताते हुए कहा कि इस तरह के प्रावधान महिलाओं के खिलाफ हिंसा को संस्थागत मान्यता देने के समान हैं। पीएफआई के मुताबिक, ऐसे नियम न सिर्फ महिलाओं की सुरक्षा को कमजोर करते हैं, बल्कि न्याय की मूल भावना के भी खिलाफ हैं।

जावेद अख्तर का तीखा बयान

प्रसिद्ध गीतकार और लेखक जावेद अख्तर ने भी इस मुद्दे पर खुलकर प्रतिक्रिया दी। 21 फरवरी को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर साझा किए गए अपने बयान में उन्होंने तालिबान के कथित कानूनों की कड़ी आलोचना की। उन्होंने लिखा कि पत्नी को पीटने को कानूनी मान्यता देना, भले ही शर्तों के साथ हो, अमानवीय है। उन्होंने भारत के मुफ्तियों और मुल्लाओं से अपील की कि वे बिना किसी शर्त के ऐसे कानूनों की निंदा करें, क्योंकि यह सब धर्म के नाम पर किया जा रहा है। अख्तर का कहना था कि किसी भी समाज में महिलाओं के खिलाफ हिंसा को वैध ठहराना सभ्य व्यवस्था के खिलाफ है।

90 पन्नों की आपराधिक संहिता

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, तालिबान के सर्वोच्च नेता Hibatullah Akhundzada द्वारा हस्ताक्षरित 90 पन्नों की आपराधिक संहिता को औपचारिक रूप दिया गया है। The Independent की रिपोर्ट के हवाले से कहा गया कि इस संहिता में घरेलू हिंसा से जुड़े विवादास्पद प्रावधान शामिल हैं।

रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि पति द्वारा की गई हिंसा पर सजा तभी लागू होगी जब गंभीर चोट के प्रमाण हों। साथ ही, आरोप सिद्ध करने का भार महिला पर डाला गया है, जिससे न्याय प्रक्रिया और जटिल हो जाती है।

बताया जा रहा है कि ऐसे मामलों में पति के लिए अधिकतम सजा 15 दिन की कैद तय की गई है। वहीं, अगर कोई महिला पति की अनुमति के बिना घर छोड़ देती है और वापस लौटने से इनकार करती है, तो उसे तीन महीने तक की जेल हो सकती है। इतना ही नहीं, यदि कोई रिश्तेदार उसे शरण देता है, तो उसे भी अपराधी माना जा सकता है। इन प्रावधानों को लेकर मानवाधिकार संगठनों ने गंभीर आपत्ति जताई है और इसे महिलाओं की स्वतंत्रता पर सीधा प्रहार बताया है।

बढ़ती अंतरराष्ट्रीय आलोचना

तालिबान के इन कथित कानूनों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना तेज हो गई है। कई सामाजिक संगठनों और बुद्धिजीवियों का कहना है कि ऐसे नियम महिलाओं के बुनियादी अधिकारों और समानता के सिद्धांत के विपरीत हैं।

जावेद अख्तर समेत कई हस्तियों ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि धर्म या परंपरा के नाम पर किसी भी तरह की हिंसा को उचित नहीं ठहराया जा सकता। यह बहस अब वैश्विक मंच पर भी तेज हो गई है और आने वाले दिनों में इस पर और प्रतिक्रियाएं सामने आ सकती हैं।

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