Dhadak 2 Review: सामाजिक भेदभाव को आईना दिखाती है सिद्धांत और तृप्ति की कहानी

Siddhant and Triptii film Dhadak 2: ‘धड़क 2’ में सिद्धांत चतुर्वेदी ने नीलेश और तृप्ति डिमरी ने विधि का किरदार निभाया है। फिल्म नीलेश और विधि की प्रेम कहानी के जरिए जातिगत भेदभाव को उजागर करती है।
धड़क 2 फिल्म रिव्यू: सामाजिक भेदभाव को आईना दिखाती है सिद्धांत और तृप्ति की प्रेम कहानी
धड़क 2 फिल्म रिव्यू
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Dhadak 2 Movie Review: धड़क 2 की शुरुआत भोपाल के भीम नगर में रहने वाले नीलेश (सिद्धांत चतुर्वेदी) से होती है, जो अपनी मां का सपना पूरा करने के लिए नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ में दाखिला लेता है। एक शादी में ढोल बजाते हुए उसकी मुलाकात होती है विधि (तृप्ति डिमरी) से, जो एक उच्च जाति से ताल्लुक रखती है। विधि एक करुणामयी लड़की है, जो जाति से ऊपर उठकर नीलेश को देखती है। लेकिन वहीं, उसके परिवार में कुछ लोग जातिगत भेदभाव के कट्टर समर्थक हैं।

फिल्म में जातिगत असमानता को बेहद वास्तविक और कच्चे रूप में दिखाया गया है। नीलेश को अपने पालतू कुत्ते की हत्या से लेकर मां की बेइज्जती तक कई त्रासदियों का सामना करना पड़ता है। वह सोचता है कि कानून की पढ़ाई करके उसकी जिंदगी बेहतर हो जाएगी, लेकिन असल संघर्ष तो कॉलेज पहुंचने के बाद शुरू होता है।

फिल्म में सौरभ सचदेवा एक निर्दयी व्यक्ति की भूमिका में हैं, जो अनुसूचित जाति के लोगों को कीट की तरह समझता है और उनका कत्ल करना सामान्य मानता है। क्या नीलेश और विधि का प्यार समाज की इस सोच से जीत पाता है, यही फिल्म का मूल है।

अभिनय: सिद्धांत चतुर्वेदी ने नीलेश के किरदार में जान डाल दी है। उनकी आंखों से लेकर संवाद अदायगी तक, हर चीज़ में किरदार के प्रति उनकी पूर्ण समर्पण भावना दिखती है। यह रोल उनके करियर के बेहतरीन किरदारों में गिना जाएगा।

तृप्ति डिमरी ने भी विधि के किरदार को संवेदनशीलता से निभाया है, लेकिन कुछ दृश्यों में उनसे और बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद थी, खासकर जब उन्हें परिवार के खिलाफ खड़े होकर बोलना था।

सौरभ सचदेवा ने अपने खलनायक किरदार से नफरत करना सिखा दिया है, यह उनकी अभिनय क्षमता का प्रमाण है। वहीं विपिन शर्मा ने एक पिता के रूप में दिल छू लेने वाला अभिनय किया है। सआद बिलग्रामी, प्रियंक तिवारी, जाकिर हुसैन और अनुभा फतेहपुरिया भी अपने-अपने किरदारों में प्रभावशाली रहे हैं।

निर्देशन और निष्कर्ष: निर्देशक शाजिया इकबाल ने विषय के साथ न्याय किया है। फिल्म में कुछ ऐसे क्षण आते हैं जब आप रो पड़ते हैं और कुछ ऐसे जब आप ताली बजाने लगते हैं। हालांकि दूसरे हाफ को और कसावट से पेश किया जा सकता था। कुछ स्लो-मोशन शॉट्स और ब्लैकआउट्स को हटाया जा सकता था, वहीं हास्य दृश्यों की अचानक उपस्थिति ने फिल्म की गंभीरता को थोड़ा नुकसान पहुंचाया।

फिल्म का संगीत, खासकर ‘बस एक धड़क’ को छोड़कर, पिछली धड़क की तरह यादगार नहीं है। लेकिन प्रोडक्शन डिजाइन और सेटिंग्स इस सामाजिक कहानी को सशक्त बनाते हैं। ‘धड़क 2’ न सिर्फ जाति-व्यवस्था की असलियत को दिखाती है, बल्कि उस संघर्ष को भी सामने लाती है जो हर उस व्यक्ति को झेलना पड़ता है जो असमानताओं के खिलाफ खड़ा होता है।

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