मर्दानी 3 से पहले रानी मुखर्जी को मिला बड़ा सम्मान, ‘अवॉर्ड ऑफ एक्सीलेंस’ पाकर भावुक हुईं बंगाली ब्यूटी
Rani Mukerji Award of Excellence: पश्चिम बंगाल के राज्यपाल ने रानी मुखर्जी को 'अवॉर्ड ऑफ एक्सीलेंस-वंदे मातरम' पुरस्कार से नवाजा है। एक्ट्रेस ने इसे अपनी जड़ों का सम्मान बताया है।
- Written By: अनिल सिंह
Rani Mukerji Award of Excellence (फोटो क्रेडिट-इंस्टाग्राम)
Vande Mataram Award: भारतीय सिनेमा की दिग्गज अभिनेत्री रानी मुखर्जी के लिए यह साल खुशियों की नई सौगात लेकर आया है। एक तरफ जहां उनकी चर्चित फ्रेंचाइजी फिल्म ‘मर्दानी 3’ की रिलीज का फैंस बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल के राज्यपाल डॉ. सी. वी. आनंद बोस ने उन्हें प्रतिष्ठित ‘अवॉर्ड ऑफ एक्सीलेंस-वंदे मातरम’ पुरस्कार से नवाजा है। यह सम्मान रानी को फिल्म जगत में उनके तीन दशकों के शानदार और प्रभावशाली सफर के लिए दिया गया है।
समारोह में व्यक्तिगत रूप से शामिल न हो पाने का दुख जताते हुए रानी ने एक बेहद भावुक संदेश के जरिए अपनी खुशी जाहिर की। उन्होंने इसे केवल एक पुरस्कार नहीं, बल्कि अपनी जड़ों द्वारा किया गया भव्य स्वागत बताया।
“बंगाली संस्कृति ही मेरी असली ताकत”: रानी मुखर्जी
अपने आभार संदेश में रानी ने बताया कि भले ही उनका पूरा करियर हिंदी फिल्मों (बॉलीवुड) में बीता हो, लेकिन उनके संस्कार और मूल्य हमेशा बंगाली रहे हैं। उन्होंने कहा, “मेरे जीवन में लचीलापन, कला के प्रति प्रेम और शांत ताकत मेरी बंगाली संस्कृति की देन है। मुझे उम्मीद है कि मैंने अपने काम से पश्चिम बंगाल का सिर गर्व से ऊंचा किया होगा।” रानी ने इस बात पर जोर दिया कि वे जिस अनुशासन के साथ काम करती हैं, वह उन्हें विरासत में मिला है।
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माता-पिता को समर्पित किया सम्मान
रानी ने अपनी सफलता का पूरा श्रेय अपने माता-पिता को दिया। उन्होंने भावुक होते हुए कहा, “मैं एक ऐसे घर में पली-बढ़ी जहाँ संगीत, साहित्य और सिनेमा जीवन का हिस्सा थे। मेरी माँ इस सबका केंद्र थीं। मेरे माता-पिता ने मुझे सिखाया कि असली ताकत जोर-जबरदस्ती में नहीं, बल्कि शालीनता और आत्म-सम्मान में होती है।” उन्होंने यह भी कहा कि फिल्मों में उनके द्वारा निभाए गए साहसी किरदारों की प्रेरणा उन्हें अपने माता-पिता की ईमानदारी को देखकर मिली है।
टैगोर और सत्यजीत रे की भूमि को नमन
बंगाल की महान परंपरा का जिक्र करते हुए रानी ने कहा कि यह मिट्टी हमेशा से विद्रोहियों, कवियों और कलाकारों की रही है। रवींद्रनाथ टैगोर से लेकर सत्यजीत रे तक, इस भूमि ने भारत की सोच को बदला है। उन्होंने कहा, “इस महान भूमि से पहचान मिलना मेरे लिए सौभाग्य की बात है। मैं इस जिम्मेदारी को पूरी विनम्रता के साथ स्वीकार करती हूँ और वादा करती हूँ कि भारतीय सिनेमा में अपनी ईमानदारी और मूल्यों के साथ काम जारी रखूँगी।”
