मर्दानी 3 रिव्यू: रानी मुखर्जी का दमदार एक्शन, लेकिन लॉजिक दूर, फिर भी दिलचस्प है कहानी
Mardaani 3 Review: रानी मुखर्जी की 'मर्दानी 3' रिलीज हो गई है। फिल्म मासूम बच्चियों की तस्करी और मेडिकल माफिया पर कड़ा प्रहार करती है। यहाँ पढ़ें फिल्म का पूरा रिव्यू।
- Written By: अनिल सिंह
Mardaani 3 Movie Review (फोटो क्रेडिट-इंस्टाग्राम)
Mardaani 3 Movie Review: रानी मुखर्जी की मोस्ट अवेटेड फिल्म ‘मर्दानी 3‘ आज सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है। यह फ्रेंचाइजी हर बार समाज के एक ऐसे कड़वे सच को दिखाती है, जिससे अक्सर हम आंखें मूंद लेते हैं। इस बार शिवानी शिवाजी रॉय का मुकाबला सिर्फ अपराधियों से नहीं, बल्कि उस अमानवीय सोच से है जो मासूम बच्चियों को ‘मेडिकल रिसर्च’ और ‘तस्करी’ की भट्टी में झोंक देती है। फिल्म कई जगह आपको बेचैन करती है, तो कई जगह तालियां बजाने पर मजबूर।
अभिराज मिनावाला के निर्देशन में बनी यह फिल्म एक डार्क थ्रिलर है, जो मनोरंजन के साथ-साथ एक कड़ा संदेश भी देती है।
अपहरण से लेकर मेडिकल माफिया तक का सफर
कहानी की शुरुआत बुलंदशहर से होती है, जहां दो बच्चियों के अपहरण के बाद पूरे प्रशासन में हड़कंप मच जाता है। मामला एनआईए (NIA) के पास पहुँचता है और एसएसपी शिवानी शिवाजी रॉय (रानी मुखर्जी) इस केस की कमान संभालती हैं। जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ती है, भिखारी माफिया की सरगना ‘अम्मा’ का चेहरा सामने आता है। फिल्म का पहला भाग काफी कसा हुआ है, जहाँ पुलिसिया कार्रवाई और माफिया की क्रूरता के बीच एक चूहे-बिल्ली का खेल चलता है। इंटरवल से ठीक पहले अम्मा द्वारा शिवानी को दी गई चुनौती फिल्म में जबरदस्त रोमांच भर देती है।
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रानी मुखर्जी की दहाड़ और मल्लिका का खौफ
एक्टिंग की बात करें तो यह रानी मुखर्जी की ‘वन वुमन शो’ फिल्म है। शिवानी के किरदार में उनकी आंखों की सख्ती और बॉडी लैंग्वेज यह बताती है कि क्यों यह फ्रेंचाइजी उनकी पहचान बन चुकी है। लेकिन इस बार उन्हें कड़ी टक्कर दी है मल्लिका प्रसाद ने। ‘अम्मा’ के किरदार में मल्लिका ने जो दहशत पैदा की है, वह लंबे समय तक याद रहेगी। रामानुजन के रूप में प्रजेश कश्यप फिल्म के असली ‘डार्क हॉर्स’ साबित हुए हैं। उनकी रहस्यमयी भूमिका कहानी में एक बड़ा मोड़ लेकर आती है, जो दर्शकों को अंत तक बांधे रखता है।
निर्देशन, कमियां और फाइनल वर्डिक्ट
अभिराज मिनावाला ने फिल्म के माहौल को बहुत ही संजीदा और डरावना रखा है। सिनेमैटोग्राफी और बैकग्राउंड स्कोर फिल्म की जान हैं, जो बिना किसी गाने के भी तनाव को चरम पर बनाए रखते हैं। हालांकि, फिल्म के दूसरे भाग में कहानी थोड़ी भटकती हुई नजर आती है। कुछ दृश्यों में ‘क्रिएटिव लिबर्टी’ के नाम पर लॉजिक को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया है, जो एक यथार्थवादी फिल्म के अनुभव को थोड़ा फीका करता है। बावजूद इसके, मजबूत क्लाइमेक्स और रानी मुखर्जी की पावर-पैक परफॉर्मेंस इसे एक मस्ट-वॉच फिल्म बनाती है।
