दिल्ली दंगे के दौरान गोली चलाता युवक। इमेज-सोशल मीडिया
Delhi Riots 2020 : 25 फरवरी 2026 को दिल्ली दंगों को ठीक 6 साल पूरे हो गए। मगर, उत्तर-पूर्वी दिल्ली के जाफराबाद, मौजपुर, भजनपुरा और शिव विहार के उन गलियों में आज भी वो जले हुए निशान बाकी हैं। जो फरवरी 2020 में खिंच गए थे। 53 लोगों की जान गई, सैकड़ों घायल हुए, घर जले, दुकानें लूटी गईं और धार्मिक स्थल तोड़े गए। 6 साल बाद भी इंसाफ की फाइल कहीं अधूरी पड़ी है।
हिंसा की जड़ें दिसंबर 2019 में पारित नागरिकता संशोधन कानून यानी सीएए में थीं। इस कानून को लेकर शाहीन बाग समेत देशभर में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन चल रहे थे। 22 फरवरी 2020 को जाफराबाद मेट्रो स्टेशन पर महिलाओं के नेतृत्व में हुए सड़क जाम ने तनाव की चिंगारी सुलगा दी। अगले दिन 23 फरवरी को मौजपुर में एक रैली और उसके बाद दिए गए अल्टीमेटम ने हिंसा को हवा दी और 29 फरवरी तक यह आग बुझ नहीं पाई।
प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित लेस्ट वी फॉरगेट कार्यक्रम में वक्ताओं ने बताया कि 116 फैसले हो चुके मामलों में से करीब 93 में आरोपी बरी हो गए, जिनमें हत्या के मामले भी शामिल हैं। कोर्ट ने खुद कई बार पुलिस जांच को कमजोर बताया और ऐसे गवाह पेश करने पर सवाल उठाए जो घटनास्थल पर थे ही नहीं। पूर्व राज्यसभा सदस्य बृंदा करात ने यह भी सवाल उठाया कि 1984 के सिख विरोधी दंगों के विपरीत 2020 के दंगों की जांच के लिए कोई आधिकारिक जांच आयोग तक नहीं बनाया गया।
#WATCH | Delhi | On the 6th anniversary of the 2020 Delhi riots, a victim, Ram Das Gupta, says, “Slogans were being chanted across the road, and the police were standing there. Suddenly, people started breaking the railing and coming towards our pump. Stones were thrown at the… pic.twitter.com/AzwMrsuExj — ANI (@ANI) February 25, 2026
5 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगों के तथाकथित बड़े षड्यंत्र मामले में एक अहम फैसला सुनाया। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने पाया कि पांच आरोपियों यानी गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शदाब अहमद की भूमिका सीमित और आनुषंगिक थी। करीब 6 साल की हिरासत और बिना मुकदमा शुरू हुए इतने लंबे समय तक जेल में रहना अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन माना गया और उन्हें जमानत दी गई। वैसे, उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका फिर खारिज कर दी गई।
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54 मृत परिवारों में से एक को छोड़कर सभी में मृतक कमाने वाले पुरुष थे। उन परिवारों के 64 बच्चों को अभी भी छात्रवृत्ति से गुजारा हो रहा है। मुआवजा अपर्याप्त रहा और आर्थिक तंगी आज भी जारी है। 6 साल बाद दिल्ली के वे जख्म अभी भरे नहीं हैं। न्याय की प्रतीक्षा जारी है।