
तनाव में 90 प्रतिशत युवा (सांकेतिक तस्वीर)
नवभारत डेस्क: इन्फोसिस के संस्थापक एन. आर. नारायणमूर्ति और एलएंडटी के चेयरमैन एस. एन. सुब्रह्मण्यम जैसे इंडस्ट्री लीडर्स एक ओर अधिक घंटों तक काम करने और वीकेंड पर भी कार्यालय आने पर जोर दे रहे हैं, दूसरी ओर, भारत की कंपनियां कर्मचारियों में बढ़ती मानसिक दिक्कतों का सामना कर रही हैं। कर्मचारियों की मदद करने वाली 1टु1हेल्प संस्था द्वारा आयोजित काउंसलिंग सत्रों से संकलित आंकड़ों के अनुसार 25 वर्ष से कम उम्र के 90% से अधिक कर्मचारी एंग्जाइटी से ग्रसित हैं, जबकि 45 वर्ष से अधिक आयु के कर्मचारियों में यह आंकड़ा 67% है। इससे साफ है कि युवा कर्मचारियों को बेहतर सपोर्ट की जरूरत है।
1टु1हेल्प की ‘स्टेट ऑफ इमोशनल वेलबीइंग रिपोर्ट 2024’ में पाया गया कि मानसिक हेल्थ संबंधी चिंताएं 15% तक बढ़ गई हैं। कार्यस्थल पर मानसिक स्वास्थ्य चुनौतियों पर यह रिपोर्ट जनवरी से नवंबर 2024 के बीच 83,000 से अधिक काउंसलिंग सत्रों, 12,000 स्वैच्छिक स्क्रीनिंग और 42,000 आंकलनों के डेटा पर आधारित है। रिपोर्ट से पता चलता है कि कॉर्पोरेट कर्मचारियों के बीच काउंसलिंग लेने की जरूरत बढ़ रही है।
चौंकाने वाली बात यह है कि प्रबंधकों द्वारा रेफर किए गए 59% कर्मचारियों में खुद का नुकसान पहुंचाने के लक्षण देखे गए, जिससे यह पुष्टि होती है कि अवसादग्रस्त कर्मचारियों की मदद के लिए प्रबंधकों को भी प्रशिक्षण देने की जरूरत है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि कर्मचारियों के आश्रित आत्महत्या के उच्च जोखिम में हैं, जिससे कर्मचारियों व उनके परिवार के सदस्यों के लिए भावनात्मक मदद बढ़ाने की अधिक जरूरत है।
1टु1हेल्प की सीईओ महुआ बिष्ट ने कहा, “हमारी रिपोर्ट में पाया गया कि प्रबंधक इसमें बड़ी भूमिका निभा सकते हैं, क्योंकि प्रबंधकों द्वारा रेफर किए गए लोगों में बड़ी संख्या में आत्मघाती प्रवृत्ति पाई गई।”
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इसका कारण स्थानांतरण, करियर में बदलाव और रिश्तों में कठिनाइयों जैसे तनाव हो सकते हैं जो आमतौर पर शुरुआती और मिड ट्वेंटी की उम्र में आते हैं।






