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India Fiscal Deficit: भारत ने हासिल किया बड़ा आर्थिक लक्ष्य, वित्त वर्ष 26 में 4.4% पर रहा राजकोषीय घाटा
- Written By: मनोज आर्या
India Fiscal Deficit: राजकोषीय घाटा, सरकार के किसी वर्ष के कुल खर्च और कुल आय में अंतर को कहा जाता है। यह वित्त वर्ष 26 में 15.19 लाख करोड़ रुपये रहा है। कंट्रोलर जनरल ऑफ अकाउंट्स ने यह जानकारी दी है।

भारतीय अर्थव्यवस्था, (सोर्स- सोशल मीडिया)
India Fiscal Deficit: भारत का वित्त वर्ष 26 के लिए राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 4.4 प्रतिशत रहा है। यह केंद्र द्वारा तय अवधि के लिए निर्धारित लक्ष्य के अनुरूप है। यह जानकारी कंट्रोलर जनरल ऑफ अकाउंट्स (सीजीए) की ओर से सोमवार को दी गई। राजकोषीय घाटा, सरकार के किसी वर्ष के कुल खर्च और कुल आय में अंतर को कहा जाता है। यह वित्त वर्ष 26 में 15.19 लाख करोड़ रुपये रहा है।
वित्त वर्ष 26 के लिए राजकोषीय घाटे का बजट में निर्धारित लक्ष्य के अनुरूप आना दिखाता है कि सरकार राजकोषीय समेकन के पथ पर बनी हुई है। राजस्व घाटा (जो सरकार के राजस्व व्यय और राजस्व प्राप्तियों के बीच के अंतर को दर्शाता है) वित्त वर्ष 2026 में घटकर जीडीपी का 1.55 प्रतिशत रह गया। वित्त वर्ष 2025 में यह घाटा जीडीपी का 1.7 प्रतिशत था।
पूंजीगत खर्च के लक्ष्य को पाने में सफल रही सरकार
राजस्व घाटे में कमी को आम तौर पर सार्वजनिक वित्त की गुणवत्ता में सुधार के रूप में देखा जाता है, क्योंकि यह दर्शाता है कि सरकारी खर्च का एक बड़ा हिस्सा दैनिक व्यय के बजाय पूंजी सृजन की ओर निर्देशित किया जा रहा है। दूसरी तरफ, केंद्र सरकार वित्त वर्ष 26 में अपने पूंजीगत खर्च के लक्ष्य को पाने में सफल रही है। बीते वित्त वर्ष के लिए पूंजीगत खर्च का अंतिम आंकड़ा 10.69 लाख करोड़ रुपये या संशोधित निर्धारित लक्ष्य 10.96 लाख करोड़ रुपये का 97.6 प्रतिशत रहा है।
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चालू वित्त वर्ष के लिए, केंद्र ने पूंजीगत व्यय का लक्ष्य 12.2 लाख करोड़ रुपये निर्धारित किया है, जो वित्त वर्ष 2026 के वास्तविक आंकड़ों से 14.1 प्रतिशत अधिक है। इसके अलावा, केंद्र ने वित्त वर्ष 2026 के लिए अपने शुद्ध कर राजस्व लक्ष्य को पूरा किया, जिसमें कुल संग्रह 26.2 लाख करोड़ रुपए रहा, जो संशोधित अनुमानों का 98 प्रतिशत है।
केंद्र ने राज्यों को लिए जारी किए 13.9 लाख करोड़
सकल कर राजस्व वित्त वर्ष 2026 में 40.2 लाख करोड़ रुपए रहा, जो संशोधित अनुमानों में निर्धारित 40.8 लाख करोड़ रुपये से कम है। केंद्र ने वित्त वर्ष 2026 में राज्यों को 13.9 लाख करोड़ रुपये जारी किए। वहीं, सरकार ने वित्त वर्ष 27 के लिए राजकोषीय घाटे का लक्ष्य 4.3 प्रतिशत रखा है, जो दिखाता है कि सरकार इस साल भी राजकोषीय समेकन के लिए प्रतिबद्ध है।
राजकोषीय घाटा कम होने से आम जनता को क्या?
राजकोषीय घाटा कम होने का सीधा मतलब है कि सरकार अपनी कमाई के मुकाबले कम कर्ज ले रही है। जब सरकार पर कर्ज का बोझ कम होता है, तो इसका देश की अर्थव्यवस्था पर बहुत सकारात्मक असर पड़ता है, जो घूम-फिरकर आम जनता की जेब और जिंदगी को सीधे प्रभावित करता है। राजकोषीय घाटा कम होने से आम जनता को ये मुख्य फायदे होते हैं-
1. महंगाई से राहत
जब सरकार बहुत ज्यादा कर्ज लेकर बाजार में पैसा खर्च करती है, तो बाजार में लिक्विडिटी (पैसे का बहाव) बढ़ने से महंगाई बढ़ने का खतरा रहता है। घाटा कम होने का मतलब है कि सरकार सोच-समझकर और सीमित खर्च कर रही है। इससे देश में महंगाई काबू में रहती है और आम जरूरत की चीजें (जैसे राशन, तेल, गाड़ियां) महंगी नहीं होतीं।
2. लोन और EMI का सस्ता होना
अगर सरकार खुद बाजार से बहुत ज्यादा कर्ज लेने लगेगी, तो बैंकों के पास आम जनता और प्राइवेट कंपनियों को देने के लिए पैसा कम बचेगा। इससे ब्याज दरें बढ़ जाती हैं। लेकिन जब सरकार कम कर्ज लेती है, तो बैंकों के पास भरपूर पैसा होता है, जिससे होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन की ब्याज दरें कम होती हैं और आपकी EMI सस्ती हो जाती है।
3. रोजगार के नए मौके
जब सरकार को कर्ज के ब्याज पर कम पैसा खर्च करना पड़ता है, तो वह उस पैसे को देश के विकास में लगाती है। सरकार नए हाईवे, रेलवे, एयरपोर्ट, और अस्पताल बनाने पर ज्यादा पैसा खर्च कर पाती है। इन बड़े प्रोजेक्ट्स के शुरू होने से सीमेंट, स्टील और कंस्ट्रक्शन जैसी दर्जनों इंडस्ट्रीज को काम मिलता है, जिससे लाखों नए रोजगार0 पैदा होते हैं।
4. कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च
सरकार अपनी कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा सिर्फ पुराने कर्ज का ब्याज चुकाने में गंवा देती है। घाटा कम होने से सरकार का यह ‘ब्याज का बोझ’ कम होता है। जो पैसा बचता है, उसे सरकार आम जनता की भलाई के लिए इस्तेमाल कर सकती है, जैसे- बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं (सरकारी अस्पतालों में मुफ्त इलाज/दवाइयां), शिक्षा में सुधार और स्कॉलरशिप, किसानों के लिए सब्सिडी और गरीब कल्याण योजनाएं।
5. टैक्स में राहत की उम्मीद
जब देश की आर्थिक सेहत अच्छी होती है और सरकार का घाटा नियंत्रण में रहता है, तो सरकार पर राजस्व बढ़ाने का दबाव कम होता है। ऐसी स्थिति में सरकार के पास डायरेक्ट टैक्स की छूट सीमा बढ़ाने या इनडायरेक्ट टैक्स की दरों को कम करने की गुंजाइश बढ़ जाती है, जिससे सीधे मिडिल क्लास को फायदा होता है।
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6. मजबूत रुपया और विदेशी निवेश
आर्थिक अनुशासन दिखने से विदेशी कंपनियां भारत में अपना बिजनेस और फैक्ट्रियां लगाने के लिए आकर्षित होती हैं। इससे देश में नई तकनीक आती है और नौकरियों के अवसर बढ़ते हैं। साथ ही, डॉलर के मुकाबले रुपया मजबूत होता है, जिससे विदेश में पढ़ाई करना, घूमना और बाहर से आने वाली चीजें (जैसे कच्चा तेल, इलेक्ट्रॉनिक सामान) सस्ती होती हैं।
Indias fiscal deficit for fy26 stood at 4 4 percent of gdp
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