मंगल पांडे: संगठन से संघर्ष तक का सफर, बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में सिवान सदर सीट से बड़ी चुनौती

Mangal Pandey: 9 अगस्त 1972 को जन्मे मंगल पांडे का राजनीतिक सफर ABVP से लेकर प्रदेश अध्यक्ष तक कैसा रहा? बिहार चुनाव 2025 में सिवान सदर सीट पर अवध बिहारी चौधरी से उनका मुकाबला एक बड़ी चुनौती है।
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मंगल पांडे, फोटो- सोशल मीडिया
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Bihar Assembly Election 2025: भारतीय राजनीति में समर्पण, संगठनात्मक क्षमता और जनसेवा की मिसाल पेश करने वाले नेताओं में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता मंगल पांडे का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के संदर्भ में, मंगल पांडे एक बार फिर चर्चा में हैं क्योंकि इस चुनाव में उनका मुकाबला सिवान सदर सीट से अवध बिहारी चौधरी से होने वाला है।

मंगल पांडे का जन्म 9 अगस्त 1972 को बिहार के सीवान जिले के महाराजगंज प्रखंड के भिरगु बलिया गांव में एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। उनके पिता अवधेश पांडे और माता प्रेमलता पांडे के वे दो पुत्रों में बड़े हैं। शिक्षा के क्षेत्र में, उन्होंने अपनी प्रारंभिक पढ़ाई महाराजगंज, सीवान से पूरी की और उच्चतर माध्यमिक शिक्षा विज्ञान विषय में देवी दयाल हाई स्कूल से प्राप्त की।

उनका पारिवारिक जीवन भी सादगी और मूल्यों से परिपूर्ण रहा है। उन्होंने 19 अप्रैल 1998 को उर्मिला देवी से विवाह किया। उर्मिला देवी सारण जिले के भिट्टी, बनियापुर की निवासी हैं और एक गृहिणी हैं। उनके पुत्र हर्ष कुमार पांडे का जन्म 25 नवंबर 2000 को हुआ, जो वर्तमान में नई दिल्ली के प्रतिष्ठित मॉडर्न स्कूल में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।

अरुण जेटली से मिली प्रेरणा

एक दिलचस्प तथ्य यह है कि 2007 में, जब मंगल पांडे भाजपा के राज्य महासचिव थे, तब वरिष्ठ नेता अरुण जेटली ने उन्हें उच्च शिक्षा प्राप्त करने की सलाह दी थी। पांडे ने इस प्रेरणा को गंभीरता से लिया और शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ने का संकल्प लिया।

राजनीतिक सफर: एबीवीपी से प्रदेश अध्यक्ष तक

मंगल पांडे ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) से 1987 में की। इसके एक वर्ष बाद 1988 से वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की शाखाओं में नियमित रूप से भाग लेने लगे। 1989 में, उन्होंने भाजपा की प्राथमिक सदस्यता ली और महाराजगंज की कार्यकारिणी समिति में शामिल हो गए। 1992 में, सीवान जिला इकाई की कार्यकारिणी में शामिल होकर उन्होंने पूर्णकालिक राजनीति में कदम रखा। उनकी कार्यकुशलता के चलते, 1994 में उन्हें भारतीय जनता युवा मोर्चा (भाजयुमो) की राज्य कार्यसमिति में जगह मिली। 1995 में, वे सारण क्षेत्र के भाजयुमो प्रभारी बने और 1997 में राज्य सचिव की जिम्मेदारी संभाली। 1997-98 के दौरान, उन्होंने लालकृष्ण आडवाणी की स्वर्ण जयंती रथ यात्रा के सह प्रभारी के रूप में भी कार्य किया।

"जवाब दो, हिसाब दो" आंदोलन

2000 में, उन्हें भाजयुमो का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। इस दौरान उन्होंने "जवाब दो, हिसाब दो" जैसे प्रभावशाली अभियानों का नेतृत्व किया। इस आंदोलन के फलस्वरूप राज्यभर में 10,000 से अधिक कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी हुई, जिसमें स्वयं पांडे को भी दो बार गिरफ्तार किया गया था।

2003 में, वे भाजपा के जोनल प्रभारी बने। इसके बाद 2005 में उन्होंने प्रदेश महासचिव की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाली। राधा मोहन सिंह के नेतृत्व में 2006, 2008 और 2010 में उन्हें लगातार इस पद पर पुनः नियुक्त किया गया। उनकी संगठनात्मक यात्रा का शिखर तब आया जब वे 2013 से 2017 तक भाजपा, बिहार के प्रदेश अध्यक्ष रहे। इस कार्यकाल के दौरान, उन्होंने प्रवासी बिहारी प्रकोष्ठ की स्थापना की। इस प्रकोष्ठ का मुख्य उद्देश्य देशभर में बसे बिहारियों को पार्टी से जोड़ने का माध्यम बनना था।

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