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सियासत-ए-बिहार: सही जगह लगा पीके का निशाना…तो महाठबंधन गाएगा जीत का तराना, जानें कैसे नीतीश को नुकसान पहुंचाएगी जन सुराज
- Written By: अभिषेक सिंह
बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले प्रशांत किशोर तेजी से एक्टिव हो गए हैं वह सभी 243 विधानसभाओं की यात्रा कर रहे हैं। ऐसे में सवाल यह है कि वह आगामी चुनाव में किसका खेल बिगाड़ने वाले हैं?

कॉन्सेप्ट फोटो (डिजाइन)
पटना: जन सुराज पार्टी के सरगना प्रशांत किशोर सिताबदियारा से शुरू हुई बिहार बदलाव यात्रा के साथ 15 दिनों में करीब 20 विधानसभा क्षेत्रों का दौरा कर चुके हैं। उन्होंने 30 से ज्यादा बड़ी और 50 से ज्यादा छोटी सभाओं को संबोधित किया है। सारण, सीवान और गोपालगंज के अलावा वे वैशाली, मुजफ्फरपुर और मोतिहारी में भी कदम रख चुके हैं। वे करीब 20-25 मिनट का भाषण देते हैं।
प्रशांत किशोर के हर भाषण की रूपरेखा एक जैसी होती है। इतनी दुर्दशा क्यों है, जिस मुद्दे पर वोट दिया गया था, वही हुआ, लालू को अपने 9वीं फेल बेटे की भी याद आती है, आपको अपने बच्चों का 15 इंच का सीना नहीं दिखता लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 56 इंच का सीना दिखता है। बिहार में बदलाव जरूरी है, सीएम नीतीश कुमार को हटाना जरूरी है। मोदी भले ही कहें लेकिन नीतीश को नहीं चुनना चाहिए।
सीएम बनना छोटा सपना: पीके
पीके के नाम से मशहूर चुनावी रणनीतिकार से राजनेता बने प्रशांत किशोर की यह यात्रा 243 सीटों तक जाएगी। हर विधानसभा में एक बड़ी और दो छोटी सभाएं उनकी योजना में शामिल हैं। माना जा रहा है कि चुनाव की घोषणा से कुछ दिन पहले ही उनकी यात्रा समाप्त हो जाएगी। जमीन से लेकर सोशल मीडिया तक उनकी चर्चा हो रही है, लेकिन वे खुद को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार भी नहीं बताते। उनका कहना है कि सीएम बनना एक छोटा सपना है।
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पीके की बातों का अर्थ समझिए
प्रशांत किशोर को भी नहीं पता कि जन सुराज पार्टी को कितने वोट मिलेंगे, कितनी सीटें मिलेंगी। वे कह रहे हैं कि बिहार में बदलाव होगा, यह तय है। नीतीश कुमार जाएंगे, यह तय है। जन सुराज सरकार बनेगी इसकी कोई गारंटी नहीं है। अगर प्रशांत किशोर जैसे अनुभवी चुनाव विशेषज्ञ यह कह रहे हैं कि जन सुराज सरकार तो तय नहीं है, लेकिन नवंबर के बाद नीतीश सीएम नहीं होंगे, तो इस बात को गहराई से देखने और समझने की जरूरत है।
क्या कहते हैं पुराने चुनावी आंकड़े?
2024 के लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार की अगुवाई वाली पार्टी को बिहार में 40 में से 30 सीटें और 47.23 फीसदी वोट मिले हैं। तेजस्वी यादव की अगुवाई वाले विपक्षी महागठबंधन को 40 में से 9 सीटें और 39.21 फीसदी वोट मिले हैं। पूर्णिया में निर्दलीय पप्पू यादव जीते और कांग्रेस में संभावनाएं तलाश रहे हैं। दोनों गठबंधनों के बीच 8 प्रतिशत वोटों का अंतर है। यह बड़ा अंतर है, जिसे पाटने की चिंता सीएम इन वेटिंग तेजस्वी को है।
लोकसभा चुनाव में 8 प्रतिशत का अंतर था, लेकिन 2020 के विधानसभा चुनाव में दोनों गठबंधनों के बीच सिर्फ .03 प्रतिशत का अंतर रह गया। एनडीए ने 37.26 प्रतिशत वोटों के साथ 125 सीटें जीतीं। महागठबंधन को 37.23 प्रतिशत वोटों के साथ 110 सीटें मिलीं। तब चिराग पासवान की लोजपा अलग लड़ी और 5.66 प्रतिशत वोटों के साथ 1 सीट हासिल की।
मुकेश सहनी की वीआईपी तब एनडीए के साथ थी, लेकिन उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (आरएलएसपी) मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) और असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम के साथ गठबंधन में लड़ी थी। कुशवाहा की पार्टी ने सबसे ज्यादा 99 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन एक भी नहीं जीत पाई। मायावती ने 1 जीती, लेकिन विधायक जेडीयू में शामिल होकर मंत्री बन गए। ओवैसी के 5 विधायक जीते।
ऐसा हुआ तो हो जाएगा खेल!
अगर हम एनडीए को चिराग पासवान और उपेंद्र कुशवाहा का वोट जोड़ दें और मुकेश सहनी का वोट घटा दें, तो यह 43.17 प्रतिशत वोट हो जाता है। अगर मुकेश सहनी का वोट महागठबंधन को जोड़ दें, तो यह 38.75 प्रतिशत हो जाता है। तेजस्वी ओवैसी से बात कर रहे हैं, जिनके 5 विधायकों में से 4 आरजेडी ने ले लिए। अगर हम ओवैसी का वोट भी जोड़ दें, तो 2020 के हिसाब से महागठबंधन के पास 39.99 प्रतिशत वोट हैं। करीब 3% वोटों का अंतर है।
नीतीश कुमार और उनकी पार्टी जेडीयू के कोर वोटर कुर्मी, कोइरी और अति पिछड़ा समाज रहे हैं। प्रशांत किशोर या उनके साथ आए आरसीपी सिंह इस वोट का कितना हिस्सा तोड़ पाएंगे, यह सवाल है। नीतीश के कोर वोटरों की नाराजगी की चिंता की वजह से ही बीजेपी नीतीश के स्वास्थ्य से जुड़े सवालों को नजरअंदाज कर उनके पीछे खड़ी है। लालू यादव के कोर वोटर यादव और मुसलमान माने जाते हैं।
कहां टिकी है पीके की नज़र?
प्रशांत किशोर के साथ मुसलमान जुड़ रहे थे, लेकिन लोकसभा चुनाव के दौरान मोदी को 300 से ज्यादा सीटें देने वाले उनके इंटरव्यू को देखने के बाद उनकी रफ्तार कम हो गई है। मुस्लिम वोटों के एक और दावेदार ओवैसी भी महागठबंधन से हाथ मिलाने को आतुर हैं। सवर्ण, दलित, वैश्य जैसे बचे हुए बड़े वोटर समूह वैचारिक या राजनीतिक कारणों से बीजेपी के साथ मजबूती से खड़े हैं। जिस पर पीके की नज़र बताई जा रही है।
एनडीए के साथ दलित वोटों के जुड़ने में चिराग पासवान और जीतन राम मांझी का भी प्रभाव है। ऐसे राजनीतिक समीकरणों के बीच प्रशांत किशोर का वोटरों को यह सलाह देना कि पीएम मोदी के आने पर भी नीतीश को वोट न दें, मोदी और बीजेपी के वोटों पर कुठाराघात है।
मौजूदा गठबंधनों पर नजर डालें तो 2020 में 3% और 2024 में 8% का अंतर ही दोनों पार्टियों के बीच जीत-हार का कारण है। जन सुराज पार्टी की नजर करीब 2% नोटा वोटों पर है क्योंकि ये वो लोग हैं जो न तो लालू को चाहते हैं, न मोदी-नीतीश को या उनकी पार्टी के उम्मीदवार को। 2025 के चुनाव नतीजों का राज इसी में है कि प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी को जितनी भी सीटें और वोट मिलेंगे, वो इस अंतर को कम करेगी या बढ़ाएगी।
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