
बिहार चुनाव, कॉन्सेप्ट फोटो
Bihar Election Result Analysis: बिहार विधानसभा चुनाव परिणामों ने सूबे की राजनीति की तस्वीर साफ कर दी है। सत्ता में काबिज एनडीए गठबंधन ने सभी अटकलों को ध्वस्त करते हुए प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में धमाकेदार वापसी की है। एनडीए को दो-तिहाई से भी अधिक सीटें हासिल हुईं, जो जनता के स्पष्ट विश्वास को दर्शाता है। वहीं विपक्षी महागठबंधन के लिए यह चुनाव गहरी निराशा और बड़े झटके के रूप में सामने आया है।
महागठबंधन के सभी दल मिलकर 50 सीट का आंकड़ा भी पार नहीं कर सके। तेजस्वी यादव की आरजेडी 30 सीटों के अंदर सिमट गई, जबकि कांग्रेस, जिसने चुनाव से पहले 80 से अधिक सीटों पर दावा किया था, महज 5 सीट जीत पाने में सफल रही। इसका असर विपक्षी खेमे पर साफ नजर आया पटना से दिल्ली तक खामोशी का माहौल छाया रहा। कांग्रेस मुख्यालय में भी सन्नाटा पसरा रहा, जबकि तेजस्वी और राहुल की यंग जोड़ी का बिहार बदलने का सपना इसी नतीजे के साथ अधूरा रह गया।
चुनाव प्रचार के दौरान राहुल गांधी और तेजस्वी यादव ने हर परिवार को नौकरी देने का बड़ा वादा किया था। राहुल गांधी ने चुनाव मैदान में उतरकर वोट चोरी जैसे आरोपों के सहारे माहौल बनाने की कोशिश की, लेकिन जनता ने इस नैरेटिव को स्वीकार नहीं किया। परिणामों ने स्पष्ट कर दिया कि मतदाताओं ने उनकी अपील को गंभीरता से नहीं लिया। उत्तर प्रदेश के बाद बिहार में भी राहुल गांधी को करारी हार का सामना करना पड़ा है।
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चुनावी नतीजों के शुरुआती रुझानों के साथ ही राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं। भाजपा प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने कांग्रेस पर तंज कसते हुए कहा कि कांग्रेस अब वह पार्टी बन चुकी है, जो जिसे छूती है उसे भस्म कर देती है। उन्होंने जनता का धन्यवाद करते हुए कहा कि बिहार ने एक बार फिर डबल इंजन सरकार पर भरोसा जताया है।
उधर, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने चुनाव आयोग और भाजपा पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि बिहार चुनाव ने SIR के खेल को उजागर कर दिया है। अखिलेश ने दावा किया कि अब यह खेल अन्य राज्यों में काम नहीं करेगा क्योंकि इसका भंडाफोड़ हो चुका है। उन्होंने आगे कहा कि उनकी पार्टी पीपीटीवी यानी पीडीए प्रहरी के जरिए भाजपा की चुनावी रणनीति को नाकाम करती रहेगी।
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राहुल गांधी और तेजस्वी यादव भी चुनाव के दौरान एसआईआर के मुद्दे पर लगातार हमलावर रहे थे, लेकिन परिणामों ने उनके इस आरोप को जनता की ओर से समर्थन नहीं दिला सका। कुल मिलाकर, इन चुनावों ने बिहार की राजनीति में सत्ता समीकरण ही नहीं बदले, बल्कि विपक्ष की रणनीति पर भी बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।






