औरंगाबाद विधानसभा: राजपूतों के गढ़ में कांग्रेस की सेंध, जानें इस बार का समीकरण क्यों है बेहद खास

Bihar Assembly Elections: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में औरंगाबाद सीट पर कांग्रेस-भाजपा के बीच कड़ा मुकाबला है। राजपूत मतदाताओं का प्रभाव, नक्सल चुनौती और बदलते जातीय समीकरण को लेकर तय होंगे परिणाम।
Aurangabad Assembly: Congress makes inroads into Rajput stronghold; learn why this time's equation is so special
औरंगाबाद विधानसभा, (कॉन्सेप्ट फोटो)
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Aurangabad Assembly Constituency: दक्षिणी बिहार का औरंगाबाद सिर्फ एक जिला मुख्यालय नहीं, बल्कि एक ऐसा क्षेत्र है जो सदियों की ऐतिहासिक विरासत और आधुनिक राजनीतिक द्वंद्व को अपने में समेटे हुए है। 2020 के विधानसभा चुनाव में महज 2,243 वोटों के मार्जिन ने साबित कर दिया कि यह सीट अब किसी एक दल का 'पक्का गढ़' नहीं रही है।

यहां का चुनावी समीकरण हर बार एक नई कहानी कहता है, और आगामी Bihar Assembly Election 2025 के लिए यह सीट बिहार पॉलिटिक्स में सबसे दिलचस्प रणभूमियों में से एक बन चुकी है।

राजपूत दबदबा और बदलते जातीय समीकरण

औरंगाबाद विधानसभा सीट को लंबे समय से राजपूत मतदाताओं का मजबूत आधार माना जाता रहा है। कुल मतदाताओं में 22 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी रखने वाला यह समुदाय अक्सर राजपूत उम्मीदवारों का समर्थन करता रहा है। 1951 में सीट की स्थापना के बाद, शुरुआती चुनावों में कांग्रेस का दबदबा रहा, जिसने आठ बार जीत हासिल की। वहीं, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने चार बार जीत दर्ज कर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई। हालांकि, 2000 में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) की जीत ने इस राजनीतिक समीकरण को तोड़ दिया। यह पहली बार था जब किसी गैर-राजपूत उम्मीदवार ने जीत हासिल की। हाल ही में, 2024 के लोकसभा चुनाव में, राजद के अभय कुशवाहा इस सीट से जीतने वाले पहले गैर-राजपूत और पहले राजद सांसद बने। यह घटना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि अब सिर्फ जाति नहीं, बल्कि दलगत गठबंधन और उम्मीदवार की छवि भी निर्णायक भूमिका निभा रही है।

2020 का हाई-प्रोफाइल मुकाबला

2020 के विधानसभा चुनाव ने औरंगाबाद को एक हाई-प्रोफाइल और कांटे की टक्कर वाली सीट बना दिया। इंडियन नेशनल कांग्रेस के उम्मीदवार आनंद शंकर सिंह ने भाजपा के चार बार के विधायक रामाधार सिंह को काफी कम अंतर से मात दी। 2015 में भी आनंद शंकर सिंह ने जीत दर्ज की थी। लेकिन 2020 में जीत का अंतर बहुत कम होने से यह संकेत मिलता है कि कांग्रेस की पकड़ मजबूत होने के बावजूद, भाजपा एक प्रबल दावेदार बनी हुई है। इस कम अंतर ने आगामी चुनाव को और भी अनिश्चित और रोमांचक बना दिया है।

स्थानीय मुद्दे और नक्सल चुनौती

औरंगाबाद की राजनीति को प्रभावित करने वाले प्रमुख मुद्दे ग्रामीण विकास से जुड़े हैं। इनमें सड़क, बिजली, पानी और सिंचाई की अपर्याप्त सुविधाएँ शामिल हैं। इसके अलावा, ग्रामीण स्वास्थ्य और शिक्षा की खराब स्थिति, बेरोजगारी और पलायन, तथा कानून-व्यवस्था भी स्थानीय एजेंडे में शीर्ष पर रहते हैं। दशकों से औरंगाबाद ने नक्सली गतिविधियों का दंश भी झेला है। हालांकि, बीते पांच वर्षों में बिहार में माओवादी घटनाओं में गिरावट आई है और राज्य सरकार ने 2025 के अंत तक इस उग्रवाद को पूरी तरह खत्म करने का लक्ष्य रखा है। यह एक महत्वपूर्ण राजनीतिक और सुरक्षा मुद्दा है जो मतदाताओं को प्रभावित करता है।

जनसांख्यिकी और आर्थिक परिदृश्य

औरंगाबाद विधानसभा, औरंगाबाद लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आती है, जिसमें कुल छह विधानसभा सीटें हैं। इस विधानसभा क्षेत्र की जनसांख्यिकी भी काफी विविध है। यहां 21.64 प्रतिशत अनुसूचित जातियां और लगभग 19 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता हैं, जो चुनावी परिणाम में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। 2020 के चुनाव में 3,17,947 पंजीकृत मतदाताओं में से 53.49 प्रतिशत ने मतदान किया था।

यह क्षेत्र मुख्य रूप से अपनी कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था से पहचाना जाता है। अदरी नदी यहां से बहती है, जबकि सोन नदी इसकी पश्चिमी सीमा को छूती है। बार-बार सूखे की चुनौती के बावजूद, किसान यहां चावल, गेहूं, दालें और सरसों जैसी मुख्य फसलें उगाते हैं। नवीनगर सुपर थर्मल पावर प्लांट ने औद्योगिक विकास को नई गति दी है, जिसने रोजगार के नए द्वार खोले हैं। वहीं, स्ट्रॉबेरी की खेती की अप्रत्याशित सफलता ने भी किसानों को आय का एक नया और आकर्षक स्रोत दिया है।

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