बांग्लादेश चुनाव में चीन का 'इस्लामिक' दांव, फोटो (सो. सोशल मीडिया) 
विदेश

1971 के 'दुश्मन' अब बने दोस्त; बांग्लादेश चुनाव से पहले चीन और जमात की जुगलबंदी ने बढ़ाई भारत की चिंता

Bangladesh News: बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाले आम चुनाव से पहले चीन और कट्टरपंथी पार्टी जमात-ए-इस्लामी के बीच बढ़ती दोस्ती ने सबको चौंका दिया है, जिससे दक्षिण एशिया के समीकरण बदल सकते हैं।

अमन उपाध्याय

China Jamaat-e-Islami Ties:  बांग्लादेश की राजनीति में इस समय एक बेहद चौंकाने वाला बदलाव देखने को मिल रहा है। आगामी 12 फरवरी को होने वाले आम चुनाव से ठीक पहले, नास्तिक विचारधारा वाली चीनी कम्युनिस्ट पार्टी और कट्टरपंथी इस्लामिक संगठन जमात-ए-इस्लामी के बीच नजदीकियां बढ़ रही हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, यह सिर्फ एक कूटनीतिक मुलाकात नहीं बल्कि एक गहरी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। हाल ही में चीनी राजदूत याओ वेन की जमात के सार्वजनिक कार्यक्रमों में मौजूदगी और बीजिंग द्वारा उन्हें दिए जा रहे समर्थन ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

चीनी राजदूत की सक्रियता और बीजिंग का निमंत्रण

इस नए रिश्ते की शुरुआत 12 जनवरी को स्पष्ट रूप से दिखी, जब चीनी राजदूत याओ वेन अचानक जमात-ए-इस्लामी के एक कार्यक्रम में शामिल हुए। इस दौरान उन्होंने जमात द्वारा किए जा रहे मानवीय कार्यों, अनाथालयों और शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान की जमकर सराहना की। इतना ही नहीं, सितंबर 2024 में मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के गठन के बाद चीनी राजदूत ने जमात के केंद्रीय कार्यालय का दौरा भी किया था। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने अब जमात के शीर्ष नेताओं को औपचारिक रूप से बीजिंग आने का न्योता दिया है जो इस बात का प्रमाण है कि चीन अब बांग्लादेश में अपनी रणनीति बदल रहा है।

क्या कहता है इतिहास?

इस दोस्ती में सबसे बड़ी विडंबना यह है कि 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान चीन और जमात-ए-इस्लामी, दोनों ने ही बांग्लादेश की आजादी का विरोध किया था। जमात ने उस समय पाकिस्तानी सेना का साथ देकर नरसंहार और बुद्धिजीवियों की हत्या में भागीदारी की थी, जबकि चीन ने 1974 तक बांग्लादेश की संयुक्त राष्ट्र में एंट्री पर वीटो लगाया था।

आज यही दोनों पक्ष भारत के प्रभाव को कम करने के लिए हाथ मिला रहे हैं। जमात और अन्य संगठनों ने हाल ही में भारत-बांग्लादेश सीमा के पास प्रदर्शन कर चीन से सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) के नजदीक बैराज बनाने की मांग भी की है।

उइगरों पर खामोशी और आर्थिक निर्भरता

खुद को इस्लाम का रक्षक बताने वाली जमात-ए-इस्लामी की पोल चीन में उइगर मुसलमानों पर हो रहे अत्याचारों पर उसकी चुप्पी से खुलती है। डिटेंशन कैंप और धार्मिक दमन के बावजूद जमात ने चीन के खिलाफ एक शब्द नहीं बोला है। वहीं, आर्थिक मोर्चे पर बांग्लादेश चीन का कर्जदार होता जा रहा है चीन के साथ उसका व्यापार घाटा 16.4 अरब डॉलर तक पहुंच गया है, जो भारत की तुलना में बहुत अधिक है। तेस्ता नदी प्रोजेक्ट और फ्रेंडशिप हॉस्पिटल जैसे प्रोजेक्ट्स के जरिए चीन बांग्लादेश की राजनीति और अर्थव्यवस्था पर अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है।

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