अल्लाह का शासन...इस्लाम के नाम पर लड़ा जाएगा बांग्लादेश में चुनाव, जमात ने प्रचार के पहले ही दिन कर दिया कांड

Bangladesh Election: बांग्लादेश में 13वें आम चुनाव के लिए जमात-ए-इस्लामी ने प्रचार शुरू किया। उनके नारे ‘गुलामी या आज़ादी’ और धार्मिक शासन की बातों से समाज में विभाजन की चिंता बढ़ी।
bangladesh Jamaat e Islami Election Campaign
बांग्लादेश में चुनाव प्रचार का आगाज (सोर्स- सोशल मीडिया )
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Jamaat e Islami Election Campaign: बांग्लादेश में 13वें राष्ट्रीय चुनाव की सरगर्मी तेज हो गई है। 12 फरवरी को होने वाले संसद चुनाव और जनमत संग्रह के लिए प्रचार अभियान 10 फरवरी तक चलेगा। इस बीच, जमात-ए-इस्लामी ने गुरुवार को अपने चुनाव प्रचार का शंखनाद किया। पार्टी प्रमुख शफीकुर रहमान ने ढाका के मीरपुर के आदर्श स्कूल मैदान में विशाल रैली का आयोजन किया, जिसने सभी का ध्यान खींचा।

रैली की शुरुआत कुरान की तिलावत से हुई। कार्यकर्ता 'गुलामी या आजादी' के नारे लगा रहे थे। मीरपुर में रैली के कारण यातायात ठप हो गया। जमात और उसके छात्र संगठन 'छात्र शिबिर' के कार्यकर्ता ट्रकों और पिकअप वैन से पहुंचे। उनका संकल्प था 'अल्लाह और कुरान की स्थापना'।

जमात-ए-इस्लामी का शक्ति प्रदर्शन

जमात-ए-इस्लामी के इस शक्ति प्रदर्शन ने कई सवाल उठाए हैं। विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी का बढ़ता प्रभाव बांग्लादेश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे के लिए चुनौती बन सकता है। रैली में कार्यकर्ताओं ने कहा कि 'कुरान की स्थापना के लिए जान और खून देना पड़े तो तैयार हैं', जिससे चुनाव को समाज में विभाजन पैदा करने वाला प्रतीत किया जा रहा है। रैली में पहली कक्षा के बच्चों को भी शामिल किया गया और उन्हें जमात का चुनाव चिन्ह 'तराजू' जीतने के नारे लगवाए गए। यह दर्शाता है कि छोटे बच्चों में कट्टरपंथी विचारधारा डालने की कोशिश की जा रही है। इसके अलावा जमात के कार्यकर्ताओं ने सार्वजनिक रूप से कहा कि वे 'जुल्म को हराकर अल्लाह का शासन' स्थापित करेंगे। कार्यकर्ता कबीर अहमद ने कहा, "अल्लाह अगर चाहे तो हम यह सीट जीतेंगे और जमात सरकार बनाएंगे।"

'इस्लाम बनाम दुश्मन' की प्रतिस्पर्धा

वरिष्ठ पत्रकार सलाह उद्दीन शोएब चौधरी के अनुसार, जमात का चुनाव प्रचार केवल राजनीतिक रणनीति नहीं, बल्कि धार्मिक निरंकुशता का उपयोग है। जब राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को 'इस्लाम बनाम दुश्मन' के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तो लोकतांत्रिक मानदंड कमजोर होते हैं और असहमति की गुंजाइश कम हो जाती है।

जमात और उसके सहयोगी दलों को आमतौर पर चुनावों में कम वोट मिलते हैं। आगामी जनमत संग्रह और चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश इस बार उनकी योजना का हिस्सा है, ताकि वे अपनी ताकत को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर सकें।  

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