West Bengal Mamata Banerjee Kalighat Faction: राज्यसभा उपचुनाव तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख और पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए एक बड़ी चुनौती होगी। राज्य की तीन राज्यसभा सीटों के लिए होने वाला यह उपचुनाव उनके लिए अपना दबदबा साबित करने का आखिरी मौका और एक अहम राजनीतिक परीक्षा हो सकता है। मौजूदा विधानसभा के आंकड़ों का विश्लेषण बताता है कि हालात बीजेपी के पक्ष में हैं, जबकि तृणमूल कांग्रेस अंदरूनी फूट का सामना कर रही है।
विधानसभा में सीटों की संख्या के आधार पर संभावना जताई जा रही है कि 24 जुलाई को होने वाले राज्यसभा उपचुनाव में बीजेपी तीनों सीटें जीत सकती है। वहीं, तृणमूल कांग्रेस के 'असली' संगठन को लेकर चुनाव आयोग के पास फैसला अभी लंबित है।
फिलहाल, पश्चिम बंगाल विधानसभा में बीजेपी के पास कुल 206 सीटें हैं। सुवेंदु अधिकारी ने भवानीपुर सीट छोड़ने के बाद नंदीग्राम निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ा था और ममता बनर्जी को हराया था। इसके अलावा, एक और सीट खाली है क्योंकि तृणमूल के पूर्व नेता हुमायूं कबीर दो विधानसभा क्षेत्रों से जीते थे।
नतीजतन, विधानसभा की प्रभावी संख्या सामान्य 294 सदस्यों से कम हो गई है। राज्यसभा चुनावों में 'सिंगल ट्रांसफरेबल वोट' प्रणाली लागू होती है। मौजूदा आंकड़े बताते हैं कि बीजेपी के पास तीनों सीटें जीतने के लिए पर्याप्त प्रथम वरीयता मत वाले वोट हैं।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, तृणमूल कांग्रेस दो गुटों में बंट गई है। एक गुट का नेतृत्व ऋतब्रत बनर्जी कर रहे हैं और खबरों के अनुसार उन्हें लगभग 62 से 65 विधायकों का समर्थन हासिल है, जबकि बाकी विधायक ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले "कालीघाट गुट" के साथ हैं। ऐसे में, कोई भी गुट अकेले राज्यसभा की एक भी सीट जीतने के लिए जरूरी संख्या बल नहीं जुटा सकता। इस बंटवारे ने तृणमूल कांग्रेस के एक भी सीट जीतने की संभावना को लगभग खत्म कर दिया है, जिससे बीजेपी को साफ बढ़त मिल गई है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐतिहासिक रूप से, पार्टी में फूट और विधायकों के पाला बदलने से राज्यसभा चुनावों के नतीजों पर असर पड़ा है। कई मौकों पर, जब क्षेत्रीय दलों के विधायकों ने पाला बदलकर बीजेपी का दामन थामा, तो राज्यसभा का गणित बीजेपी के पक्ष में बदल गया।
विशेषज्ञों का कहना है कि राज्यसभा चुनावों में अक्सर जनभावना के मुकाबले विधानसभा का गणित अधिक निर्णायक भूमिका निभाता है। पश्चिम बंगाल में भी कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिल रहा है। 'कालीघाट गुट' के लिए, 24 जुलाई के चुनाव में एक भी सीट न जीत पाना सिर्फ एक प्रतीकात्मक हार नहीं होगी। इससे संगठन पर ममता बनर्जी की पकड़ भी कमजोर हो सकती है। इसके अलावा, पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर चल रहे विवाद में बागी गुट की स्थिति मजबूत हो सकती है।
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राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इससे पार्टी के और टूटने या इस बात को लेकर कानूनी लड़ाई की संभावना बढ़ सकती है कि कौन सा गुट 'असली' TMC है। नतीजतन, नेतृत्व और पार्टी की पहचान को लेकर तृणमूल कांग्रेस के भीतर आंतरिक संघर्ष और तेज हो सकता है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले कालीघाट गुट के सामने अपने संगठनात्मक ढांचे और राजनीतिक प्रभाव को बनाए रखने की बड़ी चुनौती है।
लेख में कहा गया है कि ममता बनर्जी को लंबे समय से संघर्ष, मजबूती और मुश्किल हालात का सामना करने की क्षमता वाले नेता के तौर पर देखा जाता रहा है। जहां वे अपने समर्थकों के लिए उम्मीद और भरोसे का प्रतीक रही हैं, वहीं आने वाला समय उनके राजनीतिक करियर की सबसे मुश्किल चुनौतियों में से एक साबित हो सकता है। फिर भी, उन्होंने पहले भी कई मुश्किल हालात से सफलतापूर्वक निपटकर अपनी राजनीतिक क्षमता साबित की है।