साड़ी पहनकर करते बरोट समुदाय के पुरुष (सोर्स- awesome.amdavad)
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साड़ी पहनकर पुरुष करते हैं गरबा, मुस्लिम समुदाय के लोग भी होतें हैं शामिल, 200 साल से पुरानी है परंपरा- VIDEO

Ahmedabad Garba Tradition: अहमदाबाद में बरोट समुदाय के पुरुष नवरात्रि की आठवीं रात साड़ी पहनकर गरबा करते हैं। 200 साल पुरानी यह परंपरा साडू माता के सम्मान, आस्था और प्रायश्चित से जुड़ी है।

अक्षय साहू

Highlights:

  • अहमदाबाद के बरोट समुदाय में साड़ी पहनकर गरबा करने की परंपरा है

  • यह रस्म नवरात्रि की आठवीं रात साडू माता के सम्मान में निभाई जाती है

  • करीब 200 साल पुरानी यह परंपरा आस्था, पछतावे और प्रायश्चित से जुड़ी है

Ahmedabad Sadu Mata Garba: पूरे देश में नवरात्रि के दौरान जगह-जगह भव्य गरबा कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इसी बीच, रविवार को अहमदाबाद में एक अलग ही नजारा देखने को मिला। यहां शाहपुर इलाके की एक संकरी गली में बरोट समुदाय के पुरुष साड़ी पहनकर गरबा खेलते नजर आए। हालांकि यहां के लिए कोई नई बात नहीं है, क्योंकि पुरुष यहां साड़ी पहनकर गरबा आज से नहीं बल्कि पिछले 200 साल से खेलते आ रहे हैं। इसके पीछे बलिदान, पछतावे और अपने किए का प्रायश्चित करने की कहानी है।

साडू माता के सम्मान में साड़ी पहनकर गरबा

जानकारी के मुताबिक, बरोट समुदाय के लोग हर साल नवरात्रि की आठवीं रात को साडू माता नी पोल में एकत्रित होते हैं। इस दौरान समुदाय के कम से कम 40 पुरुष और अन्य श्रद्धालु रंग-बिरंगी साड़ियां पहनकर और माथे पर लाल सिंदूर की बिंदी लगाकर साडू माता के सम्मान में गरबा करते हैं।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल इस परंपरा में दूसरे समुदायों के 25 से 30 पुरुषों ने भी भाग लिया। इनमें मुस्लिम समुदाय के लोग भी शामिल थे। रस्म में पिछले चार दशकों से अधिक समय से हिस्सा ले रहे 60 वर्षीय सतीश बरोट ने कहा, यह मेरे लिए गर्व की बात है। मैं पिछले 40 साल से भी ज्यादा समय से इस रस्म में हिस्सा ले रहा हूं।

प्रायश्चित और आस्था से जुड़ी है परंपरा

समुदाय के लोगों के मुताबिक, यह रस्म साडू माता के प्रति आभार जताने और पुराने पछतावे का प्रायश्चित करने के लिए निभाई जाती है। उनका मानना है कि साडू माता की मृत्यु के बाद समुदाय को श्राप का सामना करना पड़ा था। इसके बाद कई पुरुषों की मौत हुई और परिवारों में अगली पीढ़ियों की संख्या भी घटने लगी।

200 साल पुरानी घटना से है संबंध

साडू माता ना गरबा की परंपरा का संबंध आज से नहीं बल्कि 200 साल पहले घटी घटना से है। जानकारी के मुताबिक, 200 साल पहले साडू माता अपनी असाधारण सुंदरता के लिए जानी जाती थीं। इसी कारण उन्हें अहमदाबाद के शाही दरबार में बुलाने का आदेश दिया गया था।

तत्कालीन शासक ने साडू माता को दरबार में पेश करने के लिए सैनिकों का एक दल भेजा था। हालांकि, बरोट समुदाय के लोगों ने उनकी इच्छा के विरुद्ध उन्हें दरबार में ले जाने का विरोध किया। इस बात को लेकर समुदाय के लोगों और सैनिकों के बीच संघर्ष छिड़ गया।

शाही दरबार नहीं जाना चाहती थी साडू माता 

जब स्थिति गंभीर होने लगी, तो साडू माता ने पहले अपनी बेटी अजूबा की हत्या कर दी। इसके बाद उन्होंने अपने पति हथीसिंह बरोट से कहा कि वे तलवार के एक ही वार से उनकी जान ले लें। साडू माता नहीं चाहती थीं कि उन्हें जबरन शाही दरबार में ले जाया जाए। उनकी मृत्यु के बाद समुदाय के लोगों के मन में गहरा दुख और पछतावा रह गया। उन्हें इस बात का अफसोस था कि वे साडू माता की रक्षा नहीं कर सके।

ऐसे शुरू हुई साड़ी पहनकर गरबा करने की परंपरा

स्थानीय समुदाय के मुताबिक, घटना के बाद समुदाय के पुरुषों ने अपनी मन्नत के तहत साडू माता, जिन्हें 'साडू बा' भी कहा जाता है, से जुड़े कपड़े पहनने का संकल्प लिया। समुदाय के लोग इसे अपनी पुरानी गलती के प्रायश्चित और साडू माता के प्रति सम्मान जताने का माध्यम मानते हैं।

उनका मानना है कि साडू माता से प्रार्थना करने के बाद परिवारों में दोबारा तरक्की होने लगी और अगली पीढ़ियां आगे बढ़ने लगीं। इससे समुदाय की इस परंपरा के प्रति आस्था और गहरी हो गई। धीरे-धीरे नवरात्रि की आठवीं रात को पुरुषों के साड़ी पहनकर गरबा करने की रस्म एक नियमित परंपरा बन गई।

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