पांडुरंग शास्त्री आठवले: जापान में एक विदेशी के तीखे सवाल ने दादाजी काे गांवों की खाक छानने पर किया मजबूर

Pandurang Shastri Athavale Jayanti Special: समाजसुधारक पांडुरंग शास्त्री आठवले की कहानी, जिन्हें जापान के एक तीखे सवाल ने लाइब्रेरी के आराम से निकालकर भारत के गांवों की पगडंडियों पर लाकर खड़ा कर दिया।
Pandurang Shastri Athavale
पांडुरंग शास्त्री आठवलेसोर्स: सोशल मीडिया
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Highlights

  • समाजसुधारक पांडुरंग शास्त्री आठवले की जयंती आज।

  • साल 1954 में जापान में एक विदेशी के सवाल ने पांडुरंग शास्त्री के जीवन की दिशा बदल दी।

  • पांडुरंग शास्त्री आठवले ने की स्वाध्याय परिवार की स्थापना।

  • पांडुरंग शास्त्री आठवले को रेमन मैग्सेसे पुरस्कार और पद्म विभूषण सम्मान मिला।

Pandurang Shastri Athavale Speech on Bhagavad Gita in Japan: बात साल 1954 की है। जापान के शिमिजु शहर में दुनिया भर के बड़े-बड़े दार्शनिक, वैज्ञानिक और विद्वान जुटे थे। मंच पर भारत से गया एक 34 साल का युवा खड़ा था। उस युवा ने जब बोलना शुरू किया, तो वेदों, उपनिषदों और श्रीमद्भगवद्गीता के व्यावहारिक ज्ञान से पूरे हॉल को मंत्रमुग्ध कर दिया। तालियों की गड़गड़ाहट के बीच पूरा हॉल उस भारतीय विद्वान के सम्मान में खड़ा हो गया। 

लेकिन, तभी दर्शकों के बीच से एक विदेशी विद्वान खड़ा हुआ। उसने उस युवा की आंखों में आंखें डालकर एक ऐसा तीखा सवाल पूछा, जिसने उस युवा दार्शनिक के पूरे जीवन की दिशा ही बदल दी। 

वह युवा कोई और नहीं, बल्कि पांडुरंग शास्त्री आठवले थे, जिन्हें आज दुनिया सम्मान से 'दादाजी' कहती है। आज, 19 अक्टूबर को उनकी जयंती यानी 'मनुष्य गौरव दिन' के अवसर पर आइए जानते हैं कि कैसे एक बौद्धिक चुनौती ने एक विद्वान को लाइब्रेरी की सुख-सुविधाओं से निकालकर गांवों की पगडंडियों पर ला खड़ा किया। 

कौन है पांडुरंग शास्त्री आठवले?

पांडुरंग शास्त्री आठवले का जन्म 19 अक्टूबर 1920 को महाराष्ट्र के रायगड जिले के रोहा में हुआ। उन्हें दादा या दादाजी के नाम से भी जाना जाता है। वे एक भारतीय कार्यकर्ता, दार्शनिक, आध्यात्मिक नेता, सामाजिक क्रांतिकारी और धार्मिक सुधारक थे। उन्होंने 1954 में 'स्वाध्याय परिवार' की स्थापना की।

स्वाध्याय भगविद गीता पर आधारित एक आत्म-अध्ययन प्रक्रिया है, जो भारत के लगभग 1,00,000 गांवों के साथ-साथ अमेरिका, यूरोप, मध्य पूर्व, ओशिनिया और अन्य एशियाई देशों में फैल चुकी है और इसके 50 लाख अनुयायी हैं। वे भगवद गीता, वेदों और उपनिषदों पर अपने प्रवचनों के लिए जाने जाते थे।

वो सवाल, जिसने पांडुरंग शास्त्री आठवले को झकझोर दिया

सन 1954 में जापान के शिमिजु शहर में आयोजित उस सम्मेलन में विदेशी विद्वान ने पांडुरंग शास्त्री आठवले से पूछा था कि श्रीमद्भगवद्गीता के ये आदर्श सुनने में बहुत अद्भुत और अलौकिक हैं। लेकिन क्या आपके देश भारत में कोई एक भी ऐसा समाज या समुदाय है, जो इन महान आदर्शों को अपनी असल जिंदगी और व्यवहार में जीता हो? या यह सब सिर्फ किताबों में लिखी बातें हैं? 

इस सवाल ने पांडुरंग शास्त्री आठवले को अंदर तक झकझोर दिया। उनके पास इसका कोई व्यावहारिक जवाब नहीं था। उस समय भारत को आजाद हुए महज सात साल हुए थे और देश गरीबी, अशिक्षा और सामाजिक कुरीतियों से जूझ रहा था। 

Pandurang Shastri Athavale receiving Templeton Prize from Prince Philip at Westminster Abbey 6 May 1997
प्रिंस फिलिप के हाथों धर्म के क्षेत्र में प्रगति के लिए टेम्पलटन पुरस्कार स्वीकार करते पांडुरंग शास्त्री आठवलेसोर्स: सोशल मीडिया
Pandurang Shastri Athavale
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लाइब्रेरी के आराम को छोड़, चुना गांवों का कांटों भरा रास्ता

जापान में पांडुरंग शास्त्री के भाषण से प्रभावित होकर नोबेल पुरस्कार विजेता आर्थर कॉम्पटन और कई अमेरिकी विश्वविद्यालयों ने उन्हें पश्चिम में रहकर आलीशान जिंदगी जीने और रिसर्च करने के बड़े ऑफर दिए। लेकिन दादाजी ने उन सभी प्रस्तावों को ठुकरा दिया। उन्होंने कहा कि मेरे पास विचार बहुत ऊंचे हैं, लेकिन मुझे पहले अपनी मातृभूमि भारत जाकर यह साबित करना होगा कि ये विचार आम इंसान की जिंदगी बदल सकते हैं।

जापान के सम्मेलन से पहले तक पांडुरंग शास्त्री आठवले का अधिकांश समय मुंबई शहर की प्रसिद्ध 'एशियाटिक सोसाइटी' की लाइब्रेरी में बीतता था, जहां वे घंटों बैठकर दुनिया भर के दर्शनशास्त्र का अध्ययन करते थे। लेकिन जापान से लौटकर उन्होंने किताबों की दुनिया छोड़ दी और गांवों की खाक छानने का फैसला किया। 

पांडुरंग शास्त्री ने शुरू की निस्वार्थ भक्तिफेरी

दादाजी ने इसे एक बौद्धिक चुनौती के रूप में लिया। उन्होंने पारंपरिक भक्ति यानी केवल मंदिर में पूजा करने को कृति-भक्ति में बदला। उन्होंने अपने साथ कुछ शिक्षित युवाओं को लिया और बिना किसी सरकारी मदद, बिना किसी चंदे या डोनेशन के अपने खुद के खर्च पर महाराष्ट्र और गुजरात के पिछड़े गांवों, आदिवासियों और मछुआरों की बस्तियों में जाना शुरू किया। इसे नाम दिया गया 'भक्तिफेरी'। 

पांडुरंग शास्त्री गांवों में जाकर किसी को उपदेश नहीं देते थे, बल्कि लोगों को गले लगाते थे। उन्होंने मछुआरों और डकैतों तक को सिखाया कि "तुम्हारे भीतर भी वही भगवान है जो महलों में रहने वालों के भीतर है। इसलिए खुद को कम मत समझो, आत्मसम्मान से जियो।" 

Pandurang Shastri Athavale
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स्वाध्याय परिवार से लाखों जिंदगियों में आया बदलाव

जापान में पूछे गए उस एक सवाल के जवाब ने 'स्वाध्याय परिवार' नाम के एक विशाल वैश्विक आंदोलन को जन्म दिया। पांडुरंग शास्त्री के इस प्रयास का चमत्कारिक असर हुआ। अपराधी और डकैत मुख्यधारा में लौट आए। तटीय इलाकों के हजारों मछुआरों और ग्रामीणों ने शराब, जुआ और घरेलू हिंसा को हमेशा के लिए छोड़ दिया।

जातिवाद और छूआछूत को पीछे छोड़कर लोग एक साथ बैठकर भोजन करने लगे। बिना किसी फंडिंग के 'योगेश्वर कृषि' यानी सामूहिक खेती और 'मत्स्यगंधा' यानी मछुआरों के लिए नाव मंदिर जैसे आत्मनिर्भर आर्थिक मॉडल खड़े हो गए, जिसने गांवों की गरीबी दूर की।

Celebrating 1997 Templeton Prize Laureate Pandurang Shastri Athavale
1997 के टेम्पलटन पुरस्कार विजेता पांडुरंग शास्त्री अठावले का सम्मानसोर्स: सोशल मीडिया

रेमन मैग्सेसे जैसे पद्म विभूषण पुरस्कारों से हुए सम्मानित

समाजसुधारक पांडुरंग शास्त्री आठवले को सामुदायिक नेतृत्व के लिए रेमन मैग्सेसे, धर्म के क्षेत्र में टेम्पलटन पुरस्कार और भारत सरकार द्वारा पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। लेकिन उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि वह समाज था, जिसे उन्होंने जापान में मिले ताने के जवाब में खड़ा किया था। एक ऐसा समाज जो आज भी गीता के आदर्शों को अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में जीता है।

किताबों से शुरू हुआ सफर करोड़ों दिलों पर खत्म हुआ

19 अक्टूबर को जब दुनिया 'मनुष्य गौरव दिन' मनाती है, तो वह वास्तव में उसी मानवीय गरिमा का उत्सव होता है जिसे पांडुरंग शास्त्री आठवले यानी दादाजी ने हर गरीब और शोषित व्यक्ति के भीतर जगाया था। 

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