वर्ष 2024 में ठाकुर जी की प्रतिमा के साथ रचाया था विवाह
दूसरे करवाचौथ पर नंदगांव में छलनी से करेंगी कन्हैया के दर्शन
नंदबाबा और मां यशोदा से लेंगी आशीर्वाद
Mathura Unique Devotion: भगवान श्रीकृष्ण की नगरी वृंदावन में भक्ति और समर्पण की एक अनोखी कहानी सामने आई है। यहां मूल रूप से हरियाणा के रोहतक की रहने वाली देवी इंदुलेखा ने अपने आराध्य ठाकुर बांके बिहारी जी को पति मानकर करवाचौथ का व्रत रखा है। सुहागिन महिलाओं की तरह वह भी श्रद्धा और आस्था के साथ इस पर्व को मना रही हैं। करवाचौथ की शाम वह नंदगांव पहुंचकर पारंपरिक शृंगार करेंगी और छलनी के माध्यम से अपने आराध्य ठाकुर बांके बिहारी जी के दर्शन कर व्रत खोलेंगी। उनकी यह अनूठी भक्ति ब्रज क्षेत्र में लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है।
देवी इंदुलेखा मूल रूप से हरियाणा के रोहतक की रहने वाली हैं और पिछले करीब तीन वर्षों से वृंदावन में निवास कर रही हैं। बताया जाता है कि वह पहले नर्स के रूप में नौकरी करती थीं, लेकिन धीरे-धीरे भगवान श्रीकृष्ण के प्रति उनकी श्रद्धा और भावनात्मक जुड़ाव गहरा होता चला गया। ठाकुर बांके बिहारी जी के प्रति उनका समर्पण इस कदर बढ़ा कि उन्होंने वर्ष 2024 में भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा के साथ विवाह रचा लिया।
इसके बाद से वह ठाकुर बांके बिहारी जी को अपना पति और सर्वस्व मानकर जीवन व्यतीत कर रही हैं। उनके लिए भगवान श्रीकृष्ण केवल आराध्य नहीं, बल्कि उनके जीवन के सबसे महत्वपूर्ण संबंध और आस्था का केंद्र हैं। इसी भाव के साथ वह धार्मिक परंपराओं और त्योहारों को मनाती हैं।
देवी इंदुलेखा के लिए यह दूसरा करवाचौथ है। इस अवसर पर उन्होंने अपने आराध्य ठाकुर बांके बिहारी जी के लिए व्रत रखा है। करवाचौथ पर विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के साथ व्रत रखती हैं। इंदुलेखा भी इसी परंपरा को अपने आराध्य के प्रति प्रेम और समर्पण के भाव से निभा रही हैं।
शाम को वह पारंपरिक शृंगार कर नंदगांव पहुंचेंगी। यहां छलनी के माध्यम से ठाकुर जी के दर्शन करना उनके व्रत का प्रमुख हिस्सा होगा। उनके लिए यह रस्म केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि अपने आराध्य के प्रति प्रेम और अटूट विश्वास व्यक्त करने का माध्यम है।
देवी इंदुलेखा की भक्ति का एक और खास पहलू नंदगांव से जुड़ा है। भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप और उनकी लीलाओं से जुड़े नंदगांव को वह अपना ससुराल मानती हैं। उनकी मान्यता के अनुसार, नंदबाबा और माता यशोदा उनके लिए माता-पिता के समान हैं। इसी भाव के साथ वह नंदगांव पहुंचकर उनका आशीर्वाद लेने की भावना रखती हैं।
ब्रजभूमि सदियों से कृष्ण भक्ति, प्रेम और समर्पण की परंपराओं के लिए प्रसिद्ध रही है। यहां भक्त भगवान को अलग-अलग भावों से अपना आराध्य मानते हैं। देवी इंदुलेखा का ठाकुर बांके बिहारी जी को पति मानकर करवाचौथ मनाना भी उनकी व्यक्तिगत आस्था का एक अनूठा उदाहरण है।
देवी इंदुलेखा की कहानी एक बार फिर वृंदावन की उस आध्यात्मिक परंपरा की ओर ध्यान खींचती है, जिसमें भक्त अपने आराध्य को जीवन का अभिन्न हिस्सा मानते हैं। करवाचौथ पर नंदगांव में छलनी से ठाकुर जी के दर्शन और नंदबाबा-माता यशोदा का आशीर्वाद लेने की उनकी तैयारी ने इस प्रसंग को खास बना दिया है।
मथुरा में एक जगह ऐसी भी है जहां करवाचौथ और अहोई अष्टमी नहीं मनाए जाने की परंपरा प्रचलित है। सुरीर कस्बे के वघा मोहल्ले में औरतें करवाचौथ का व्रत नहीं करती हैं। स्थानीय लोकमान्यता के अनुसार, करीब 300 वर्ष पहले नौहझील क्षेत्र के रामनगला गांव का एक ब्राह्मण युवक अपनी नवविवाहित पत्नी को यमुना पार स्थित ससुराल से भैंसा-बग्घी में विदा कराकर लौट रहा था।
बताया जाता है कि सुरीर के वघा मोहल्ले में भैंसे को लेकर युवक और ठाकुर समाज के कुछ लोगों के बीच विवाद हो गया। इस दौरान मारपीट में ब्राह्मण युवक की मौत हो गई। पति की मृत्यु से आहत उसकी पत्नी ने कथित तौर पर हमलावरों को श्राप दिया और सती हो गई।
स्थानीय मान्यता के अनुसार, इस घटना के बाद मोहल्ले में युवाओं की मौतों का सिलसिला शुरू हो गया। इसके बाद से वहां की महिलाएं पति की दीर्घायु के लिए करवाचौथ और संतान की सलामती के लिए अहोई अष्टमी का व्रत नहीं रखतीं। हालांकि, इस घटना और श्राप से जुड़ी मान्यताओं की स्वतंत्र ऐतिहासिक पुष्टि आवश्यक है।