Fadnavis Overrides Shinde Decision: महाराष्ट्र की राजनीति में मराठी मानुष और मराठी भाषा का मुद्दा हमेशा से सबसे बड़ा सियासी हथियार रहा है। आगामी चुनावों को देखते हुए मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने इसी मराठी कार्ड के जरिए मुंबई के ऑटो और टैक्सी चालकों के लिए मराठी भाषा को अनिवार्य करने का बड़ा दांव खेला था।
लेकिन केवल 24 घंटे के भीतर भाजपा और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इस पर पानी फेर दिया। फडणवीस के एक फैसले ने न केवल शिंदे सेना के आक्रामक रुख को नरम कर दिया, बल्कि यह भी स्पष्ट कर दिया कि महायुति सरकार में अंतिम नियंत्रण और पावर की असली चाबी केवल देवेंद्र फडणवीस और भाजपा के हाथों में ही केंद्रित है।
शिवसेना के लिए मराठी अस्मिता का मुद्दा उसकी स्थापना और राजनीतिक अस्तित्व से जुड़ा है। BMC के चुनावों में शिवसेना UBT और मनसे के मराठी कार्ड की काट के लिए शिंदे सेना ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया। शिवसेना के परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक के विभाग ने ऑटो-टैक्सी चालकों के लिए मराठी अनिवार्य करने का कड़ा नोटिफिकेशन जारी किया था।
इस मुहिम को भुनाने के लिए स्वयं उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने बोरीवली में एक विशाल कार्यक्रम का आयोजन किया और मराठी सीखने वाले 20,000 गैर-मराठी चालकों को प्रमाणपत्र बांटे। उनका कहना था कि चालकों को कम से कम इतनी मराठी आनी चाहिए कि वे बुजुर्ग यात्रियों से संवाद कर सकें। प्रताप सरनाईक का भी स्पष्ट रुख था कि अगर महाराष्ट्र में धंधा करना है, तो मराठी बोलनी ही होगी और उल्लंघन करने वालों पर दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।
शिंदे सेना के इस भव्य कार्यक्रम के ठीक अगले ही दिन मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने एक बड़ा प्रशासनिक फैसला लिया। भाजपा नेता हाजी अशरफ के नेतृत्व में चालक संगठनों के एक प्रतिनिधिमंडल से सह्याद्रि गेस्ट हाउस में मुलाकात के बाद, फडणवीस ने चालकों को मराठी सीखने के लिए एक साल की और मोहलत दे दी और इस दौरान किसी भी दंडात्मक या कानूनी कार्रवाई को पूरी तरह खारिज कर दिया।
राजनीतिक विश्लेषक इसे फडणवीस द्वारा अपने ही परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक के नोटिफिकेशन को सीधे तौर पर ओवरराइड यानी दरकिनार करने के रूप में देख रहे हैं। यह निर्णय परिवहन विभाग से चर्चा किए बिना सीधे मुख्यमंत्री स्तर पर लिया गया था, जिससे साफ संदेश गया कि सरकार में अंतिम फैसला लेने की ताकत किसके पास है।
भाजपा के इस कदम के पीछे गहरे राजनीतिक समीकरण छिपे हैं। मुंबई में बड़ी संख्या में उत्तर भारतीय चालक हैं जो पारंपरिक रूप से भाजपा के बड़े समर्थक हैं। भाजपा इस बड़े वोट बैंक को नाराज करने का जोखिम नहीं उठा सकती।
इसके अलावा, उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव करीब होने के कारण और वहां समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव द्वारा इस मराठी नियम की तीखी आलोचना के बाद, भाजपा राष्ट्रीय स्तर पर इसे हिंदी बनाम मराठी का विवाद नहीं बनने देना चाहती थी।
इस फैसले के बाद शिंदे सेना के भीतर गहरी असहजता और निराशा का माहौल है। शिवसेना के अंदरूनी सूत्रों का मानना है कि महीनों की मेहनत और पार्टी के इतने बड़े कार्यक्रम के तुरंत बाद आए इस फैसले ने उनके मराठी क्रेडिट लेने के अभियान को भारी नुकसान पहुंचाया है। असली चिंता इस बात की है कि जनता के बीच यह संदेश चला गया है कि सरकार के फैसलों का रिमोट कंट्रोल पूरी तरह से भाजपा के पास है। भाजपा नेता हाजी अशरफ का यह बयान कि राजनीति करने वालों का खेल अब खत्म हो गया है, सीधे तौर पर शिंदेसेना के मंत्रियों पर तंज माना जा रहा है।
भले ही प्रताप सरनाईक ने मुख्यमंत्री के फैसले का सम्मान करने की बात कही हो, लेकिन इस पूरे प्रकरण ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भाजपा महायुति में शिंदे सेना को एक सीमा से आगे बढ़ने नहीं देना चाहती और महाराष्ट्र की सत्ता की असली कमान आज भी देवेंद्र फडणवीस के हाथों में ही है।