

BJP Shinde Sena Conflict Over Marathi Rule: महाराष्ट्र की राजनीति में मुंबई के ऑटो और टैक्सी चालकों का क्षेत्र एक नया राजनीतिक अखाड़ा बन चुका है। महायुति सरकार के दो प्रमुख सहयोगियों भाजपा और शिवसेना शिंदे गुट के बीच मुंबई के ऑटो और टैक्सी चालकों के लिए अनिवार्य मराठी भाषा के नियम को लेकर खुलकर मतभेद सामने आ गए हैं।
एक तरफ जहां शिंदे गुट इस नियम को लेकर सख्ती बरतने के मूड में था, वहीं मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इस पर ढील देकर बीच का रास्ता निकालने का प्रयास किया है। इस पूरे घटनाक्रम ने महायुति गठबंधन के भीतर तालमेल की कमी और आगामी चुनावों को लेकर दोनों दलों के अलग-अलग राजनीतिक समीकरणों को उजागर कर दिया है।
शिवसेना के लिए मराठी मानुष और मराठी भाषा का मुद्दा केवल सरकारी नीति नहीं, बल्कि उसकी दशकों पुरानी पहचान और पार्टी के इतिहास से जुड़ा है। शिवसेना के संस्थापक बालासाहेब ठाकरे ने 1966 में पार्टी की स्थापना इसी मराठी पहचान के मुद्दे पर की थी।
यही कारण है कि शिंदे गुट इस मुद्दे को लेकर बेहद आक्रामक है। इस नीति के तहत, परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक के विभाग ने चालकों के लिए मराठी सीखना अनिवार्य करने का नोटिफिकेशन जारी किया था।
इस सख्ती को प्रदर्शित करने के लिए उप-मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने बोरीवली में एक भव्य कार्यक्रम आयोजित किया, जहां उन्होंने मराठी भाषा का बुनियादी प्रशिक्षण पूरा करने वाले 20,000 गैर-मराठी भाषी चालकों को प्रमाणपत्र बांटे। उनका तर्क था कि महाराष्ट्र में काम करने वाले हर चालक को कम से कम बुनियादी मराठी बोलनी आनी चाहिए ताकि वे यात्रियों, विशेषकर बुजुर्गों से संवाद कर सकें।
परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक का स्टैंड बिल्कुल साफ था कि अगर महाराष्ट्र में धंधा करना है, तो मराठी बोलनी ही होगी। उन्होंने चेतावनी दी थी कि एक साल के बाद किसी को भी छूट नहीं दी जाएगी और नियम न मानने वालों पर कार्रवाई होगी।
शिंदे गुट के इस बड़े शक्ति प्रदर्शन के ठीक एक दिन बाद, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने एक बड़ा फैसला लेते हुए चालकों को मराठी सीखने के लिए एक साल की और मोहलत दे दी। फडणवीस ने स्पष्ट किया कि इस एक वर्ष के दौरान किसी भी चालक के खिलाफ कोई दंडात्मक या कानूनी कार्रवाई नहीं की जाएगी।
दरअसल, भाजपा नेता हाजी अशरफ के नेतृत्व में विभिन्न चालक संगठनों के एक प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री से सह्याद्रि गेस्ट हाउस में मुलाकात की थी और दलील दी थी कि अलग-अलग उम्र और कम शिक्षा के कारण चालकों के लिए इतनी जल्दी मराठी सीखना बेहद कठिन है। मुख्यमंत्री ने इस मांग को स्वीकार कर लिया।
राजनीतिक विश्लेषक इस फैसले को मुख्यमंत्री द्वारा अपने ही परिवहन मंत्री के नोटिफिकेशन को दरकिनार करने के रूप में देख रहे हैं, जिसने शिंदे गुट के भीतर गहरी नाराजगी और असहजता पैदा कर दी है।
इस पूरे टकराव के पीछे दोनों दलों के अपने-अपने वोट बैंक की गणित है। मुंबई में ऑटो और टैक्सी चलाने वाले अधिकांश चालक उत्तर भारतीय हैं, जो पारंपरिक रूप से भाजपा के बड़े समर्थक माने जाते हैं। ऐसे में भाजपा नहीं चाहती कि इस अनिवार्य नियम के कारण उसके इस बड़े समर्थक वर्ग को परेशानी हो या उनके रोजगार पर कोई संकट आए।
इसके अलावा, उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव भी नजदीक हैं। समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव जैसे नेताओं ने पहले ही इस मराठी नियम की तीखी आलोचना की है। ऐसे में भाजपा राष्ट्रीय स्तर पर इसे हिंदी बनाम मराठी का विवाद बनने देना नहीं चाहती।
दूसरी तरफ, शिवसेना के भीतर इस बात को लेकर भारी निराशा है कि महीनों की मेहनत और उनके बड़े कार्यक्रम के तुरंत बाद मुख्यमंत्री ने यह ढील दे दी। शिवसेना के नेताओं का मानना है कि इससे यह संदेश गया है कि अंतिम फैसला लेने की चाबी केवल भाजपा और मुख्यमंत्री के हाथ में है, जिससे शिवसेना के मराठी क्रेडिट लेने के अभियान को झटका लगा है।
यही वजह है कि भाजपा नेता हाजी अशरफ ने तंज कसते हुए कहा कि जो लोग इस मुद्दे पर राजनीति कर रहे थे और कार्रवाई की धमकी दे रहे थे, उनका खेल अब खत्म हो गया है।
हालांकि, प्रताप सरनाईक ने मुख्यमंत्री के फैसले का सम्मान तो किया है, लेकिन साथ ही कड़े लहजे में यह भी कह दिया कि हम 36 साल से 1989 के नियम के लागू होने का इंतजार कर रहे हैं, एक साल और सही, लेकिन इसके बाद कोई मोहलत नहीं मिलेगी।